Saturday, 4 June 2016

परीक्षा मे विफलता या यमदेव का जाल ( सामयिक आलेख)

परीक्षा मे विफलता या यमदेव का जाल

आजकल टॉप रेंक से पास होने वाले छात्रों में से अधिकतर दूर विदेशों में फुर्र होने जाने का ख्वाब पालते हैं वहीं कम नम्बर से पास होने या फेल हो जाने वाले छात्रों के बीच भगवान की दुनिया में फुर्र हो जाने का चलन जोर पकड़ता जा रहा है। परीक्षा परिणाम के सीज़न में रोज एक दो खबर अखबार व टीवी की सनसनी बनती है। इसीलिये शायद कुछ विश्वविद्यालय देर से परिणाम घोषित कर ऐसे छात्रों की ज़िन्दगी में कुछ अतिरिक्त दिन जोड़ने का प्रयास करते हैं। कोई भी व्यक्ति इस दुनिया को अपनी मर्जी से छोड़कर नहीं जाना चाहता। किंतु यमराज को भी अपने बॉस से टॉरगेट मिला होता है जिसे पूरा कर उन्हें एक निश्चित संख्या में प्राणियों को इस दुनिया उस दुनिया में ट्रांसफर करना होता है। युद्ध, दंगा-फसाद, भूकम्प, बाड़, बीमारी, दुर्घटना, अपराध आदि से हुई मौतों से भी जब यमदेव का टॉरगेट पूरा नहीं होता है तो वे इंसानों की ज़िन्दगी में दु:ख,  असफलता, नुकसान, मान-अपमान की ऐसी कहानियाँ रच देते हैं ताकि वे डिप्रेशन में आकर स्वयं इस दुनिया से अपना स्तीफा दे दें।

मुझे भी ऊपर वाले ने कई बार असफलता के उपहार देकर अपने जाल में फंसाने की कोशिश की मगर मैं हर बार बच निकला। स्कूल कालेज में अपन हमेशा ही फ्रंट बेंचर रहे। फ्रंट बेंचर यानि टीचर जो भी सवाल पूछे तुरंत हाथ उठा कर उसका सही उत्तर देकर तारीफ का हकदार बनना तथा उनकी गुड लिस्ट में रहना, कमजोर साथियों को नोट्स देना तथा मदद करना, वाद-विवाद तथा निबन्ध प्रतियोगिता में भाग लेकर पुरूस्कार जीतना, अड़ोस-पड़ोस के बच्चों को लेसन समझा कर उनकी मम्मियों से दाद बटोरना आदि। शानदार क्लास परफारमेंस के बावजूद मैं पी एम टी पास (1971) पास न कर सका। बड़ी किरकिरी हुई किंतु सुसाईड जैसा वाहियात खयाल मन में न लाकर  मैने यम के इरादों को फेल कर दिया । यम की दूसरी कोशिश अगले साल फिर हुई जब अभ्यंकर कोचिंग़ क्लास जॉईन करने के बावजूद दूसरे अटेम्प्ट में भी पी एम टी क्लीयर नहीं हो पाई। फिर बी एस सेकेण्ड इयर में सप्लीमेंट्री, फिर सप्लीमेंट्री में भी फेल। अब तो इंतहां हो गई थी। आजकल के चलन के अनुसार तो मुझे यम के टॉरगेट में एक नम्बर का इजाफा कर चुकना था। पर अपन जाल में नहीं फंसे। बॉयोलाजी छोड़कर कॉमर्स ले लिया। वहां भी अपन झंडे गाड़कर फ्रंट बेंचर बन गए। टीचर मेरा परिचय अपने बेस्ट स्टूडेंट के रूप में करवाते थे। बस जब परीक्षा का मौका आता था कि यमदेव याददाश्त पर पानी फेर देते थे। बी.काम, एम.काम. पास तो की किंतु नम्बर मत पूछियेगा।

आगे पड़ाई को विराम देते ही यम से भी पीछा छूट गया और किस्मत चमक गई। 1974 में आय बी एम द्वारा आयोजित आय क्यू टेस्ट पास करते ही प्रथम जनरेशन के कम्प्यूटर व पंच कार्ड सिस्टम पर काम करने का मौका मिला। फिर दूसरी जनरेशन फिर तीसरी और प्रतिभा परवान चड़ती गई, व्यक्तित्व निखरता गया। तब पता चला कि वह अच्छी आय. क्यू. ही थी जिसने मुझे हमेशा फ्रंट बेंचर बना कर रखा। और यह सत्य जाना कि सफलता के लिये बेहतर अकेडेमिक़ रिजल्ट हमेशा जरूरी नहीं है। एक दशक में प्रोग्रामर और अगले पांच वर्षों में ई डी पी मेनेजर बन गया। उन दिनों हर किसी को कम्प्यूटर का ज्ञान नहीं होता था और कम्प्यूटर विभाग के लोगों को बड़ी इज्जत के साथ देखा जाता था। फेक्ट्री के चीफ एक्जीक्यूटिव तथा मालिक भी नाम के आगे ‘जी’ लगा कर बात करते थे। आज देश की एक बड़ी आय. टी कम्पनी में सीनियर मेनेजर होने के साथ चर्चित कवि एवं लेखक भी हूँ।         
किसी को और जिन्दगी में क्या चाहिये। सफलता और असफलता की कहानी और लम्बी है किंतु जो बात मैं कहना चाहता हूं वह स्पष्ट हो चुकी है। असफलता और दु:ख से घबरा कर मौत को गले लगाने का कृत्य मानों यम की चाल में फंसना है।


आज सोचता हूं कि आखिर मैं यम की चालों में फंसने से कैसे बच गया। तो इस बात का मेरे पास एक ही उत्तर है कि यम मेरा दिल कई बार तोड़ने में सफल हो गए पर मेरे दिमाग को खंरोंच भी नहीं पहुँचा सके। दोस्तों असफलता चाहे कितनी ही बार आए, दिल चाहे कितनी ही बार टूटे पर दिमाग के कल-पुर्जे सही सलामत रखें। असफल होने के बाद नई राह ढूंढें और फिर सफलता के लिये प्रयास आरम्भ कर दें। एक दिन सफलता अवश्य आपके कदम चूमेंगी।   

लेखक : महेन्द्र सांघी 'दद्दू' 

तुम बिन (कविता)

तुम बिन

घर से दूर तुम जाती हो
और घर मुझसे रूठ जाता है
भोजन के समय घर लौटता हूं
तो खाली घर मुझे खाता है

तुम्हारे पल्लू की तलाश में
चाबियां इधर उधर हो जाती हैं
मेरी नज़रें भी रूठी हैं मुझसे
सामने रखी चीजें नज़र नहीं आती हैं
नींद भी मेरी रूठ गई है मुझसे
सपनों की जगह यादों का है डेरा
अब क्या बताऊं  तुम्हें ऐ प्रिये
तुम बिन बुरा हाल है मेरा

रूठ गई हैं खुशियाँ मुझसे
जबसे तुम नहीं रही करीब
लगता है अब तक की सारी खुशियाँ 
तुम्हारा ही तो थी नसीब

घर का कोना-कोना पूछता है मुझसे
कब घर लौटेगी हमारी मालकिन
इन रूठों को मनाने को, तुम्हें लेने आने को
मैं भी गिन रहा हूँ पल और दिन

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रचियता : महेन्द्र सांघी