Saturday, 4 June 2016

तुम बिन (कविता)

तुम बिन

घर से दूर तुम जाती हो
और घर मुझसे रूठ जाता है
भोजन के समय घर लौटता हूं
तो खाली घर मुझे खाता है

तुम्हारे पल्लू की तलाश में
चाबियां इधर उधर हो जाती हैं
मेरी नज़रें भी रूठी हैं मुझसे
सामने रखी चीजें नज़र नहीं आती हैं
नींद भी मेरी रूठ गई है मुझसे
सपनों की जगह यादों का है डेरा
अब क्या बताऊं  तुम्हें ऐ प्रिये
तुम बिन बुरा हाल है मेरा

रूठ गई हैं खुशियाँ मुझसे
जबसे तुम नहीं रही करीब
लगता है अब तक की सारी खुशियाँ 
तुम्हारा ही तो थी नसीब

घर का कोना-कोना पूछता है मुझसे
कब घर लौटेगी हमारी मालकिन
इन रूठों को मनाने को, तुम्हें लेने आने को
मैं भी गिन रहा हूँ पल और दिन

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रचियता : महेन्द्र सांघी 

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