Sunday, 24 August 2014

पाकिस्तान से वार्ता ( ‌‌पान की दुकान पर )

(विनोद वार्ता)

वेबू - क्यों भई काका सुबह सबेरे कहां से चले आ रहे हो और दोनों हाथों से ये माथा क्यों पकड़ रखा है?

काका- अरे पाक उच्चायुक्त ने हुर्रियत नेताओं से मुलाकात करने का फैसला किया और भारक पाक के बीच होने वाली सचिव स्तर की बात मोदी सरकार ने रद्द कर दी। आगे की बात बन और अब पाक ने सीमा पर गोलाबारी भी बड़ा दी है। अपना तो माथा सन्नाया हुआ है। पिछले दो घंटों में सिर दर्द के विज्ञापन वाली सारी गोलियां एक-एक करके आजमा ली, मगर दर्द कश्मीर के सवाल पर पाकिस्तान के रुख की तरह अड़ा हुआ है।

वेबू- हां आज का अखबार और सारे चैनल भी भारतपाक के बिगड़ते रिश्तों की ही गाथा सुना रहे है।

काका- इस बारे में तो अब तुम कोई बात न करो तो मेहरबानी होगी।

वेबू- काका हर देशवासी का कर्तव्य है कि देश की रक्षा के मसलों पर पूरे तन, मन, धन से सहयोग न दे सके तो नाक, कान, गले से तो दे। अतः सभी को चाहिए कि सारी खबरों को सूंघकर, सुनकर अपनी गली, अपने दायरे में उस पर आगे चर्चा करे। हो सकता है ऐसे ही समुद्र मंथन से भारत-पाक और कश्मीर समस्या का हल निकल आए।

काका- अफसोस की बात है कि खुले दिलों से चर्चा में करने का दावा करने वाले नेता बातचीत को जारी नहीं रख पाए। न चाहते हुए भी आखिर काका बोल पड़े।

वेबू- काका यह तो होना ही था। उच्च पदों पर विराजमान नेता, अधिकारियों के अपने स्वयंके इतने निहित स्वार्थ, अक्षमताएं, सैनिक/राजनैतिक मजबूरियां होती हैं कि समस्या के समाधान के बजाय वे निरर्थक बयान बाजियों में ही उलझे रहते हैं। उन्हें अपनी एक-एक बात तौल कर बोलनी होता है तो वे विपक्षी की कही बात के छिलके उतारने में भी देर नहीं लगाते है।

काका- हंसकर बोले यदि तुम देश के प्रधानमंत्री होते तो क्या करते?

वेबू- अपन काका ठहरे आम आदमी। अपना प्रधानमंत्री होते तो पाकिस्तान से बात निचले स्तर से आरंभ करते।

काका- जरा बात को विस्तार से खींचकर बताओ।

वेबू- अरे काका अपन सबसे पहले पाकिस्तान की किसी पान की दुकान के चार ग्राहकों को निमंत्रण देते जिसमें भारतीय पान की दुकान के भी चार ग्राहक शामिल होते। यू नो, चर्चा करना पान की दुकान के ग्राहकों का रोजमर्रा का काम है। एक्सपर्ट होते हैं वे इसमें। पान की दुकानों पर कितनी ही समस्याएं आकर निपट भी जाती हैं। उसका मीडिया भी अनुमान नहीं लगा सकता।

काका- तुम ठीक कह रहे हो। तुम्हारी प्रस्तावित चर्चा के लिए आ रहे डेलिगेशन की सुरक्षा और यात्रा पर कोई तामझाम भी नहीं होता और करोड़ों के खर्चे बच जाते।

वेबू- पांच सितारा होटल भी बुक नहीं करना पड़ती। बैठक भी भारत-पाक की बॉर्डर की किसी पान की दुकान पर हो जाती।

काका- लंबे चौड़े खाने के मीनू भी न बनाने पड़ते। वार्ताकारों को बस पान पेश कर दिए जाते वर्क लगाकर।

वेबू- इन बचे करोड़ों रुपयों से कश्मीर में कई पान की नयी दुकानें खुल जाती, लोगों को रोजगार मिलता और युवा आतंकवाद में शरीक होना बंद कर देते।

काका- और पान की दुकान पर लोग अदब मुलाहिजा सीखते भाई चारा बढ़ाते।

वेबू- चर्चा में समय की भी बचत होती। पान के शौकीनों के पास पाव आधे घंटे से अधिक वक्त कहां होता है? वे तो इतने समय में ही कठिन से कठिन समस्या का तिंया पांचा करने में समर्थ हैं।

काका- चलो अभी कहां कश्मीर का हल निकलने वाला है। अभी तुम युवा हो। कॉलेज में हो। छात्र संघ के चुनाव में खड़े हो जाओ। जब एक चाय वाला देश का प्रधान मंत्री बन सकता है तो भविष्य में तुम क्यों नहीं।

वेबू- हो सकता है काका इस समस्या का हल मेरे संभावित प्रधानमंत्रित्व काल में ही लिखा हो। पहली सफल पान वार्ता के बाद यह चर्चा पूरे भारत व पाकिस्तान की पान की दुकानों पर फैल जाएगी, जिसमें दोनों देशों की अवाम हिस्सा लेगी। फिर देखना इस चर्चा की छाछ पर मक्खन सा तैरता हुआ हल किस तरह सामने आता है।

Wednesday, 23 April 2014

मतदान केन्द्र पर मीना बाज़ार





क्सर मतदान केन्द्र स्कूलों, सामुदायिक भवनों जैसी बड़ी जगहों पर होते हैं जहाँ काफी खुली जगह होती है। वैसे देखा गया है कि इन जगहों पर जनता के लिये सुविधा नाममात्र की होती है। यहाँ दूरदराज इलाके से कोई मतदान के लिये आए तो उसे पीने के लिये पानी तक नसीब नहीं हो। ऐसा क्यों।

गली मोहल्ले में गणेश पूजा या दुर्गा पूजा का छोटा सा आयोजन होता है तो उसके लिये प्रायोजक मिल जाते हैं जो अपने विज्ञापन के झंडे, बैनर टांग देते है या दुकान सजा लेते है और बदले में आयोजक को मोटी राशि दे देते हैं जिससे न केवल उसके खर्च निकल जाते हैं बल्कि कई बार मुनाफा भी निकल आता है। कई बार प्रायोजक का खर्च अधिक हो जाता है किंतु उचित प्रचार न होने की दशा में फायदा नहीं मिलता।

सरकार जो कि चुनाओं में जनता से टेक्स के रूप में प्राप्त भारी भरकम राशि खर्च करती है क्यों न हर मतदान केन्द्र पर प्रायोजकों की मदद ले। क्या हानि है यदि हर मतदान केन्द्र पर छोटी-बड़ी कम्पनियों को अपने उत्पादों की प्रचार सामग्री लगाने की सशुल्क इजाजत दे दी जाए। सोचने की बात है कि जिस जगह क्षेत्र की 60 से 70% बहुसंख्य जनता जुटने वाली हो वहां अपने उत्पाद के प्रचार के लिये कितनी कम्पनियाँ इकठ्ठा हो जाएंगी। हर मतदान केन्द्र पर मीना बाज़ार तक लग सकता है। तरह तरह के उत्पाद और दुकानें। मतदान करने के सबूत के तौर पर ऊँगली की स्याही दिखाने पर दाम में विशेष छूट। मनोरंजन के सारे लटके-झटके जैसे शॉट गन, रिंग, चकरी-झूले, महिलाओं के लिये कंगन-चूड़ियों की दुकान, जलेबी-चाट-ऑईस्क्रीम, गन्ने का रस, बरफ गोले के खाऊ ठिये। मीना बाजार ऐसा हो कि जो लोग मतदान करने नहीं जाते हों उनके बच्चे मेले (मतदान केन्द्र) पर चलने की जिद करने लगें।

राजनैतिक दलों के लिये सम्भव नहीं होता कि हर मतदाता तक सम्पर्क के लिये पहुँच सकें। मतदान केन्द्र पर हर प्रत्याशी अपना स्टाल लगा सकता है जहाँ वह अपनी पूर्व उपलब्धियों तथा वादों तथा घोषणापत्र को प्रदर्शित कर सके। मतदाता पहले इन स्टालों पर घूम फिर कर स्वयं की जानकारी को व्यवस्थित कर ले फिर सोच समझ कर वोट दे।

केन्द्र पर एक स्टाल पुलिस का भी हो जहाँ मतदाता प्रत्याशी का ताजातरीन आपराधिक रेकार्ड देख सके। पुलिस की गिरफ्त में कई वारंटी भी आ सकते हैं जो उन्हें विगत पांच सालों में नहीं मिले हों और वोट डालने आए हों।     

सोचिये आज जो मतदान बिलकुल नीरस होता है वह कितना रोचक-मनोरंजक हो उठेगा। मतदान के प्रतिशत में बड़ोतरी महँगाई की वृद्धी को पीछे छोड़ देगी। आचार संहिता के अंतर्गत राजनीतिक दलों को जनता को उपहार देने पर पाबन्दी है मगर मतदान के बाद तो जनता को उपहार दिये ही जा सकते हैं। सरकार व्यवस्था कर सकती है कि जो भी वोट डालेगा उसे लौटते समय रियायती दर पर पांच किलो शकर मिलेगी। इससे अधिकतम लोग वोटिंग के लिये टूट पड़ेंगे।

तय मानिये कि यदि उपरोक्त सुझाव को मान लिया जाए तो सिर्फ एक दिन में ऐसी रेकार्ड तोड़ बिकी होगी कि सेंसेक्स उपर छलांग मारेगा और टेक्स के रूप में राजस्व प्राप्ति के भी नए रेकार्ड बनेंगे। मतदाता भी उजाड़ केन्द्रों के स्थान पर ऐसे जगह पर वोट  डालने जाएगा जहाँ प्रायोजक लोग उसके लिये कालीन बिछा कर उसका स्वागत करने के लिये तत्पर बैठे होंगे।

कहने की ज़रूरत नहीं कि प्रायोजकों से प्राप्त राशी से सरकार का खर्च मुनाफे में बदल जाएगा। सरकार भी इस मुनाफे को अपनी तिजोरी में रखने के बजाए तत्काल केन्द्र पर ही खर्च कर दे। उदाहरण के लिये गरीब जनता कि लिये मतदान केन्द्र पर ही मुफ्त चिकित्सा जांच व निदान शिविर लगाया जा सकता है। फिर देखियेगा कैसे लोग वोट  डालने नहीं आते।

फिर हंग़ विधानसभा या लोक सभा की स्थिति आने पर चिंता न रहेगी। मध्यावधि चुनाव का भार उठाने के लिये प्रायोजक खुशी-खुशी पुन: तत्पर जो रहेंगे।    

Saturday, 15 March 2014

मैं गलत हूँ या नियमों में सुधार होना चाहिये?



साथियों यातायात नियमों के चलते गत दो दिनों में मुझ छोटी कार वाले ( मारूति 800) को दो बार तीन-तीन सौ रूपयों का फटका लग गया। कल जंजीर वाला चौराहे पर अपनी कार सड़क किनारे खड़ी करके रोहित केमिस्ट से दवाई खरीद रहा था कि यातातात पुलिस की क्रेन ने मेरी गरीब कार (मारूति 800) के पहियों में जंजीर डाल दी और टोइंग चार्जेस के 300/- रूपये झटक लिये। केमिस्ट से खरीदा गया सौ रूपयों का वेपोरायजर 400/- रूपयों में पड़ा। आज पुन: आनंद बाजार में रोड की साईड में कार खड़ी करके पंतजली से खराब गले के लिये आयुर्वेदिक दवाई खरीद रहा था कि एक बार फिर मुई क्रेन भूत की तरह प्रकट हुई और 300/- रूपयों का फटका लगाते हुए मेरे दिन भर के आनन्द की वाट लगा दी। लिहाजा मैनें 215 रूपयों की दवाई में से सिर्फ 35/- की दवाई रखी और 180/- रूपये घाटे की पूर्ति के लिये दवा लौटा कर बचा लिये। 60 वर्ष की उम्र पार कर लेने के बाद भी (जब सरकारी कर्मचारी रिटायर होकर अपनी कमाई का सुख भोग रहे होते हैं) मुझ जैसे आम आदमी को इसलिये काम करना पड़ता है क्योंकि आज की मंहगाई के जमाने में काम किये बिना जिन्दा नहीं रहा जा सकता हैं। मुझ जैसे अनेक इंसानों की संतानें अपने मां बाप को अकेला छोड़ कर प्रदेश के बाहर जाकर नौकरी कर रही है क्योंकि भष्ट नेता अधिकारियों ने टेक्स के पैसे अपनी जेबों में भरकर प्रदेश में विकास तो अवरूद्ध किया ही बल्कि जो उद्योग धन्दे इलाके की पहचान थे उन्हें भी अपनी गलत नीतियों से ताला लगा दिया।

हां, मैने मोटर व्हीकल एक्ट की धाराओं के तहत गलत जगह कार पार्क की और उसी की मुझे कीमत चुकाना पड़ी मगर मेरे मन में उठे कुछ प्रश्नों का समाधान कौन करेगा? प्रथमत: दोनों स्थानों पर मेरी कार काफी चोड़ी रोड़ पर साईड में दबाकर खड़ी की गई थी और उनसे यातायात में कोई व्यवधान नहीं हो रहा था। दूसरा शहर में पार्किंग के मुफ्त या पेड पार्किंग स्थान हैं कहाँ जहां मैं अपनी गाड़ी खड़ी करता। बताईये जंजीर वाला चौराहे पर स्थित ढेर सारी दवाई की दुकानों में से किसी एक से दवाई खरीदनी हो तो रोड के अलावा कोई जगह है जहाँ कोई कार पार्क कर सके। जनता वस्तुओं की कीमत में समाहित उत्पादन कर सरकार को दे, जमाने भर की वस्तुओं की खरीद पर विक्रय कर और सेवाओं (जो कोई और आपको दे रहा है) पर सेवा कर सरकार को दे। इनकम टेक्स भी दे, वाहन के लिये रोड टेक्स भी दे, सड़कों और पुलों पर से गुजरने के लिये टोल टेक्स भी दे, नाकारा सरकार और सिस्टम की वजह से पूरा पैसा चुकाकर भी नकली और मिलावटी चीजें खरीदने को भी मजबूर हो और फिर भी उसके पास सड़क पर वाहन खड़े करने का अधिकार नहीं। यदि सड़क पर वाहन खड़े करना जुर्म है तो क्या यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि वह समुचित जगहों पर पार्किंग की सुविधा मुहैया करवाए।
इन्दौर जैसे शहर में कम से कम एक लाख वाहन तो हरदम नियम विरूध्ध सड़क पर खड़े रहते ही हैं। अगर इतने लोग नियम तोड़ रहे हैं तो यह उनकी लापरवाही नहीं मजबूरी है जिसे वे जुर्माना भरने के तुरंत बाद फिर दोहराने के लिये मजबूर रहेंगे। मेरे मत में सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के लिये नियमों का अक्षरथ: पालन करना जरूरी नहीं है वे परिस्थितियों को देखते हुए स्वविवेक से जनहित में नियमों में ढील भी दे सकते हैं। पार्किंग के नियम इसलिये हैं कि यातायात अवरुद्ध न हो, अन्य वाहन चालको को असुविधा नहीं हो और दुर्घटनाएं नहीं हों। तो यातातात क्रेन को उन्हीं गाड़ियों पर कार्यवाही करना चाहिये जिनके कारण यातायात बाधित हो रहा हो न कि सड़क किनारे खड़ी हर गाड़ी पर। अक्सर मै देखता हूं कि रेस कोर्स रोड, जो कि शहर की अधिकतम चोड़ी सड़क है, पर साईड में खड़ी गाड़ियों पर रोज क्रेन जुर्माना ठोकती रहती है जबकि वहां कभी ट्रेफिक जाम नहीं होता। नहीं दूसरी और शहर के अनेक इलाके ऐसे हैं जहां लोग सिरफिरे तरीके से आड़े तिरझे वाहन खड़े कर देते हैं जिससे पूरा यातायात रूक जाता है। वहां जनता की मदद के लिये कोई क्रेन नहीं होती है। एक बार आर एन टी मार्ग की एक बिल्डिंग में रविवार को उठावने में शामिल हुआ। हमारी दो गाड़ियां रोड की बाजू में डली सफेद रेखा के अन्दर पार्क थी मगर क्रेन ने आकर चालान बना दिया। अब बताईये आर एन टी मार्ग जैसी चोड़ी सड़क पर, रविवार को जब यातायात था ही नहीं, क्या हमारी कारें यातायात में बाधक थीं। हां दीवान जी ने हमारे अनुरोध को स्वीकार कर स्वविवेक (जिसका मैने उपर उल्लेख किया है) का उपयोग किया और दो में से सिर्फ एक कार का जुर्माना वसूला। ऐसे स्वविवेक का उपयोग पहले पुलिस करती भी थी मगर जबसे शायद क्रेन को वसूली का टारगेट मिलने लगा है तब से वह सिर्फ उन चोड़ी सड़कों पर विचरती हैं जहां उसे पर्याप्त शिकार भी मिलते रहें और स्वंय क्रेन को चलने में आसानी भी हो और वह जाम में नहीं फंसे। शहर की अनेक दुकानों का धन्दा इसलिये भी खराब है क्योंकि वहां क्रेन के बहुत अधिक फेरे लगते है। लगता है कि अब बड़े माल्स जहां बड़ा पार्किंग एरिया होता है, के अलावा सड़क की अन्य किसी दुकान से खरीदारी करना जोखिम भरा हो चुका है। दोस्तों जबतक किसी गाड़ी से यातायात अवरूद्ध न हो या अन्य वाहन चालकों को परेशानी नहीं हो तब तक नियम में ढील दी जाकर जनता को राहत दी जानी चाहिये। अन्यथा सरकार या तो सार्वजनिक पार्किंग स्थान बड़ाए या फिर इतनी अधिक गाड़ियों को लाईसेंस न दे। क्या कहते हैं आप?        

Saturday, 8 March 2014

सन टु हुमन मेडीटेशन इंट्रोडक्शन केंप' - 18



सन टु हुमन मेडीटेशन इंट्रोडक्शन केंप' - 18
एक बार फिर से ईशकृपा गार्डन, बंगाली चौराहे के पास सुबह 6:30 एवं शाम 6:00 बजे से। दस दिवसीय पूर्णतया निशुल्क। वर्थ टु बी अटेंडेड। 

दिनांक 26/12/2011 के केम्प के बारे में नईदुनिया में "इन्दौरीपन की एक पहचान को बॉय-बॉय" शीर्षक से प्रकाशित मेरा आलेख
  
इस शीर्षक को पढकर आप चौकिये या हँसिये मत। अपने इंदौरीपन की प्रमुख पहचान के बारे में आप यहाँ के किसी भी बाशिंदे से पूछेंगे तो वह नींद में भी यही जवाब देगा कि पोहा-जलेबी, समोसा-कचोरी का नाश्ता और खाने की अनेकों वैरायटीयों के साथ लोंग़ की सेंव का तडका। कोई भी इन्दौरी इन खाद्य पदार्थों के बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकता। मगर यह असम्भव सम्भव में बदल सकता है यदि आप मेरी तरह पप्पू भैया के निशुल्क दस दिवसीय ' सन टु हुमन मेडीटेशन इंट्रोडक्शन केंप' अटेंड करें जिसमें सन टु हुमन लिव इन रिलेशनशिप एवं हम और हमारे बच्चे इनर्जी से भरपूर कैसे हों, के बारे में बताया, सिखाया और करवाया जाता है। बंगाली चौराहे के पास ईशकृपा गार्डन में 18 दिसम्बर 2011 से जब यह केम्प आरम्भ हुआ तो अपने राम ने यह कह कर दो दिन निकाल दिये कि भई अपन तो नौकरी वाले हैं, समय पर काम पर जाना होता है, फिर ठंड में जल्दी उठते भी नहीं बनता। जब अगले दो दिनों तक केम्प की खूब तारीफ सुनी, कॉलोनी के सब लोग अलसुबह नवरात्री के देवी-दर्शन की तरह गार्डन की और जाते दिखाई दिये तो मन नहीं माना और चौथे दिन अपन भी सपत्नीक इस यज्ञ में शामिल होने चल दिये। हिदायत थी कि यथासम्भव ठंडे ठंडे पानी से नहाकर बिना चाय-बिस्कुट खाये-पिये आना है मगर अपन बिना नहाये चाय गटक कर केंप पहुँच गये। वहाँ जाकर देखा कि सभी लोग शर्ट और बनियान उतार कर और सूर्य की और मुख करके भरी ठंड में दोनों हाथ ऊपर किये जम्पिंग कर रहे हैं ताकि सूर्य की ऊर्जा अपने शरीर में समाहित कर सकें, अपने फेफडों में अधिकतम ऑक्सीजन पहुँचा कर उन्हें स्वस्थ बना सकें, घुटनों के जोडों को मजबूत बना सकें और साथ ही पैरों के तलुओं का व्यायाम कर सुप्त नाडी केन्द्रों को जाग्रत कर सकें। बताया गया कि प्रात: सूर्य के सामने की गयी यह जम्पिंग हमें दिन भर के लिये चार्ज कर देती है। उसके बाद शुरू हुआ " अरे जा रे नटखट न छेड मेरा घूंघट" जैसे अनेक मधुर गीतों की धुन पर सामुहिक नृत्य। विशाल जनसमूह के हाथ पैर और कमर मस्ती में थिरक उठे। सभी इस नृत्य के माध्यम से न केवल उत्तम व्यायाम कर रहे थे बल्कि सूर्य के आशीर्वाद के रूप में और अधिक ऑक्सीजन ले रहे थे और साथ ही अपने शरीर को लचीला भी बनाते हुए आनन्द मग्न हो रहे थे। मुझे लगा कि रोज सुबह के मेरे बोरिंग मार्निंग वाक से यह व्यायाम अधिक उपयुक्त था। व्यायाम के हर एक्शन के पीछे छुपी लॉजिक को भी समझाया जा रहा था। हाथ ऊपर रखने से हार्ट को खून ऊचाई पर पहुचाना पडता है अतः वह मजबूत होता है साथ ही ऊंगलियों के माध्यम से शरीर सूर्य ऊर्जा को जल्दी ग्रहण करता है। लगातार ताकत के साथ ताली बजाने, जिसमें दोनो हाथॉ की ऊंगलियाँ आपस में टच न हों, से हार्ट के वाल्व मजबूत होते हैं। नृत्य के बाद शुरू होता है पप्पू भैया से वार्तालाप, ऑडियो-वीडियो तथा स्टेज शो के माध्यम से। विभिन्न पौराणिक कथाओं तथा आधुनिक रिसर्च का हवाला देते हुए वे अनेक उपयोगी जानकारियाँ  प्रदान करते हैं जिससे आप अपने शरीर को समझ सकें तथा उसे स्वस्थ, नीरोगी व ऊर्जावान बनाने के लिये सम्यक व्यायाम और सम्यक आहार के बारे में जान सकें। पप्पू भैया आहार के विषय में विस्तृत जानकारियाँ देते है। उनके अनुसार सम्यक व्यायाम के साथ सम्यक आहार नहीं लिया जाये तो बहुत नुकसान पहुँच सकता है। कुछ विशेष  बातें हैं जिनके लिये पप्पू भैया की तारीफ करनी होगी। केम्प सभी धर्म के लोगों के लिये खुला है। सूर्य सभी प्राणियों व पेड पौधों सहित हर इंसान चाहे वह किसी भी जाति का हो अपनी ऊर्जा प्रदान करता है फिर आपस में जातिगत भेदभाव कैसा? पप्पू भैया कहते हैं कि सिर्फ सूर्य को अपना गुरू मानो और किसी अन्य बाबा, गुरू या महात्मा को बीच में मत आने दो। जिस तरह आप किसी मशीन को जाने बिना उसे चला नहीं सकते उसी तरह अपने शरीर के सुपर कम्प्यूटर के बारे में अधिक से अधिक जानों और उसकी केयर करो। माताएँ भी इस बारे में अपने बच्चों को शिक्षित करें। उनके अनुसार हमें हाथ में कोई भी नाडा बान्धने की जरूरत नहीं और न ही किन्हीं रत्नों वाली अँगूठियाँ पहनने की। नृत्य प्रोग्राम के बाद सम्यक आहार के रूप में दो मोसम्बियों के साथ अमरूद, सेब, भीगा मेथी व मूगफली दाने, अलसी, कच्ची लोकी और ताजी बगार लगाई हुई छाछ का नाश्ता दिया जाता है। केम्प में बताई गयी अनेक बातों तथा एलोपेथी अथवा अन्य पेथियों के डाक्टरों के विचारों में विरोधाभास हो सकता है। मगर पप्पू भैया स्वयं कहते हैं कि उनकी बताई हर बात को क्यों क्या और कैसे की कसौटी पर स्वयं परख कर ही अपनायें। पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए सभी लोगों को नाश्ते के लिये अपने साध प्लेट, कटोरी गिलास तथा चाकू लाना होता है ताकि प्लास्टिक डिस्पोजल्स का उपयोग न करना पडे। पुराने जमाने के सामुहिक भोजो की तरह लोग इन्हें बिना शरम अपने साथ ला भी रहें है। कहने की जरूरत नहीं कि अगले दिन से मेरी चाय बिलकुल बन्द हो गयी, सुबह जल्दी उठकर ठन्डे पानी से स्नान का क्रम सम्यक व्यायाम व आहार के साथ शुरू हो गया। सिर्फ दो ही दिनों मे महंगाई सी ऊचाई पर चल रहा मेरा ब्लड शुगर लेवल सेंसेक्स की तरह गिरकर नीचे आ गया। धन्यवाद पप्पू भैया लेते नहीं, कहते हैं कि सूर्यदेव को दे दो अत: उनके और उनके साथियों के इस अभिनव प्रयास के लिये शुभकामनायें। तो इन्दौरीपन की पहचान मगर अस्वाथ्यकर जलेबी-पोहा-समोसा-कचोरी-सेंव को मैने बॉय-बॉय जरूर कह दिया है मगर यदा कदा कभी कभी मिलने का ऑप्शन खुला है, आखिर इन्दौरी हूँ ना।