Tuesday, 19 July 2016

दद्दू की गुरु पूर्णिमा बनाम गूगल गुरु..

वेबदुनिया ' दद्दू का दरबार में अपलोडेड' (2015)

प्रश्न : दद्दूजी आज गुरु पूर्णिमा है। आपने किस गुरु को प्रणाम कर उनकी चरण वंदना की?
उत्तर : देखिए गुरु वह है, जो अपने शिष्यों को उचित ज्ञान देकर उनके जीवन को सफल और सुखी बनाए। आज के हाईटेक जमाने में इस कसौटी पर गूगल गुरु से अधिक उपयुक्त गुरु कौन हो सकता है जिसके पास दिन-रात के चौबीस घंटों अपने शिष्यों को देने के लिए विविध और असीमित ज्ञान हो। अत: दद्दू ने गूगल गुरु के चरणों यानी माऊस-की-बोर्ड को नमन कर लिया। आप भी यदि गूगल को गुरु बनाईयो तो जरा ध्यान रखियो कि इस गुरु की बताई सारी बातों को जस का तस ना मानकर थोड़ा अपना दिमाग भी लगाईयो, जो गुरुओं के गुरु ऊपर वाले भगवान ने हमें दिया है।
प्रश्न : दद्दूजी आज के गुरु अपने द्वारा दिए जा रहे ज्ञान की कीमत वसूल लेते हैं, क्या उन्हें गुरु माना जाना चाहिए?
उत्तर : देखिए कीमत तो प्राचीनकाल के गुरुकुल के गुरु भी गुरु-दक्षिणा के रूप में लेते थे, किंतु वह अलग-अलग शिष्य से उसकी क्षमता के अनुसार ली जाती थी, जैसे राजपुत्र से ज्यादा और निर्धन से कम, सक्षम से कठिन और औसत से सरल। फिर यह दक्षिणा सफल शिष्यों को ही देनी होती थी। यदि आपका इशारा आज के प्राइवेट स्कूलों और कोचिंग संस्थानों से है तो वे अपनी दक्षिणा एडवांस में वसूल लेते है फिर चाहे वह सफल हो या न हो। चूंकि शिक्षा आज व्यापार बन गई है अत: जिंदगी में यदि चुकाई गई फीस से आप ज्यादा कमा लो तो अपने शिक्षकों को गुरु मानकर अवश्य नमन कर लेना।
प्रश्न : दद्दूजी क्या गधा भी किसी का गुरु बन सकता है?
उत्तर : बन क्या सकता है, वह तो देश के असंख्य लोगों का गुरु है। गधे का एकमात्र दर्शन यही है कि अपने मालिक द्वारा किए जा रहे हर अन्याय को चुपचाप सहते हुए लद्दू की तरह दिनभर काम करो और रात को चैन की नींद सोते हुए जिंदा रहो। आज देश की बहुसंख्य जनता भ्रष्ट सरकारों, नेताओं, अधिकारियों, मिलावट और मुनाफाखोर व्यापारियों, गुंडे-दादा-पहलवानों द्वारा की जा रही लूट और अन्याय को चुपचाप सहती जा रही है तो उनका गुरु गधा नहीं तो और कौन है।
प्रश्न : दद्दूजी क्या गुरु के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने शिष्यों को शिक्षा के साथ संस्कार भी दे। व्यक्ति को प्रथम संस्कार अपने माता-पिता से प्राप्त होते हैं इसीलिए उन्हें प्रथम और सबसे बड़ा गुरु कहा जाता है। यदि वे अपने बच्चे को संस्कार न दे पाएं?
उत्तर : तो संस्कार देने के लिए अन्य बाहरी गुरु हैं ही। यदि वे भी असफल हो जाएं तो ऐसे बिगड़ैलों को संस्कार देने का दायित्व देश के कानून, पुलिस, अदालतों और जेलरों के पास है।
प्रश्न : दद्दूजी क्या देश के नेताओं को अपना गुरु माना जा सकता है।
उत्तर : आज के जमाने का गणित यही है कि जिस भी व्यक्ति से आपको तनिक से भी फायदे की उम्मीद हो तो उसे तुरंत अपना गुरु मान लो। इस गणित के अनुसार नेताओं को गुरु मानने में लाभ ही लाभ है, जो अरबों रुपयों में हो सकता है। मगर ध्यान रहे, ये भी हो सकता है कि नेताजी के शिष्य (जिन्हें चमचे या समर्थक के नाम से भी जाना जाता है) बनने के चक्कर में आपके पास जो है, वह भी न लुट जाए या आपके जेल जाने की नौबत न आ जाए। आपको लाठियां न खानी पड़ जाए, सिर न फूट जाए या हाथ-पैर न टूट जाए। बहुत खतरे वाला सड़कछाप तरीका है यह्।
प्रश्न : दद्दूजी क्या बच्चे बड़ों के गुरु हो सकते हैं?
उत्तर : हो नहीं सकते बल्कि घर-घर में होते हैं, जो अपने बड़ों को कम्प्यूटर, मोबाइल और टीवी के फंक्शंस चलाना सिखाते हैं।
प्रश्न : दद्दूजी जिस तरह अलग-अलग विषयों के अलग-अलग विशेषज्ञ होते हैं, क्या उसी तरह अलग-अलग विषयों के लिए एक से अधिक गुरु भी रखने चाहिए?
उत्तर : अवश्य ही रखे जा सकते हैं, मगर ध्यान रहे कि जितने गुरु होंगे उन्हें उतनी ही अधिक दक्षिणा भी देनी होगी। जेब में माल हो तो ठीक वरना बेहतर होगा कि कोई एक ऑलराउंडर गुरु ही ढूंढें।
दद्दूजी, देश की जनता किस तरह के गुरुओं से सबसे अधिक प्रभावित होती है?
लोगों विशेषकर युवाओं में सबसे ज्यादा पसंदीदा गुरु फिल्मों के हीरो-हीरोइन होते हैं। अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं तथा टीवी विज्ञापनों के माध्यम से ये ही अपने शिष्यों (फेंस) को बताते हैं कि कौन से साबुन से नहाना और कपड़ों की धुलाई करना है तथा किस डिटर्जेंट से घर के बर्तन मांजना है। किस तरह के वस्त्र और अंतरवस्त्र धारण करना है, कैसा पानी पीना है और कौन-सी खुशबू वापरना है।
दद्दूजी, यदि कोई गुरु अपने शिष्यों को छल-कपट वाला रास्ता अपनाने की सलाह दे तो उसे गुरु की बात मानना चाहिए?
यदि उस सलाह से धर्म की रक्षा होती हो तथा अन्य कोई उपाय नहीं हो तो अवश्य मानना चाहिए, जैसी कि पांडवों ने महाभारत युद्ध के दौरान भगवान श्रीकृष्ण की मानी थी।

महेन्द्र सांघी 'दद्दू'

Monday, 11 July 2016

My face book post 10 July 2016

 सेना द्वारा मारे गए हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद  जनाजे में बड़ी संख्या में लोगों का जुड़ना, उसे शहीद का दर्जा देने की कोशिश करना, पुलिस व सेना पर प्रति आक्रमण करना तथा आगजनी और दंगा फैला कर महौल को खराब करना कब तक सहन किया जाएगा। इसका एक अर्थ यही है कि एक एक आतंकवादी के पीछे सौ सौ गद्दार हैं जिनकी वफादारी भारत नहीं बल्कि पाकिस्तान के प्रति है।ऐसे लोग वतन और सेना के लिये कितने खतरनाक हो सकते हैं यह हम सेना पर हमले तथा बिना किसी मोर्चे पर जाए कायरता पूर्वक हमारे वीर सैनिकों को मौत बांटे जाने की घटनाओं से साफ है। मोदी सरकार व प्रशासन को चाहिये कि किसी भी आतंकवादी का शव परिवार को सौंपने के स्थांपर उसे पुलिस अभिरक्षा में दफन किया जाए। जनाजे में परिवार वालों तथा अन्य किसी भी व्यक्ति के शामिल होने पर छूट हो बस फर्क इतना हो कि जनाजे में शामिल होने वाले हर व्यक्ति से फोटो आय डी की कापी ली जाए, उसकी वीडियो ग्राफी हो तथा जनाजे तथा दफनाने की पूरे प्रक्रिया की भी वीडियो ग्राफी हो। कोई भी देश विरोधी नारा बर्दश्त नहीं किया जाए। ऐसा नारा लगाने वाले पर तुरंत कार्यवाही हो। सभी आय डी की बाद में गहन जांच की जाकर पता लगाया जाए कि उनमें से कोई देश द्रोही गतिविधी में तो शामिल न है। आतंकवादी की मौत की खबरों के बाद राजनीति करने वाले लोगों के बयानों पर कानून बनाया जाकर उन्हें सेंसर किया जाए।