Friday, 29 March 2013

बाय-बाय चेन चोरी के धन्धे को (एक चेन चोर की जुबानी)



लोग समझते हैं कि चेन चोरी बहुत ही मुनाफे का धन्धा है, मगर एक बार जरा इस करिअर क्षेत्र में आकर देखें तो आखें खुल जायेगी। आजकल की महिलायें बहुत ही समझदार होती जा रही हैं। जब जब किटी पार्टी में जाती हैं, एक दूसरे को समझाती रहती हैं कि चेन पहन कर बाहर मत निकला करो। कोई भी महिला चेन पहन कर सडक पर निकली नहीं कि मोहल्ले की चार पडोसनें उसे ऐसे टोक देती है मानो देसी दवा का नुस्खा बता रही हों। आज के जमाने की सासें भी चेन पहनकर मन्दिर कहाँ जाती हैं? उन्हें तो बस सास-बहू सीरियल्स से ही फुरसत नहीं मिलती। चेन पहनने की औकात रखने वाली मैडमें कार के बिना कहीं आती-जाती नहीं। अब गिनती की जो महिलाएं घर से बाहर पैदल जाती हैं उनकी तलाश में हर रोज़ इतना पेट्रोल फुंक जाता है जितने में हफ्ते भर की भाजी आ जाए। पिछले सालों में महंगाई और बेरोजगारी चार गुना बड़  गयी है मगर चेन चोरी के अवसर बमुश्किल डेढ गुना हुए हैं। चोरों की संख्या मे वृद्धी की दृष्टि से देखें तो ये अवसर आधे ही रह गये हैं।



लोगों को लगता है कि बस एक झपट्टा मारा और 25-30 हजार रुपयों के वारे-न्यारे। मगर ऐसा नहीं है। चोरी में सफल हो गये तो कम से कम तीन साथियों को पतली सी चेन का एक तिहाई टुकडा मिलता है वह भी तब, जब आधी चेन शिकार के हाथ में नहीं रह गयी हो। उस टुकड़े को बेचने जाओ तो बदले में आधे पैसे मिलते हैं। फील्ड मे बने रहने के लिये लगातार फिटनेस भी बनाये रखना पडती है। क्रिकेट की तरह नहीं जहाँ पुराने प्रदर्शन की बदौलत गाड़ी भी चलती रहती है और एड भी मिलते रहतें हैं।   



हडबड़ी मे भागते समय अपन या गाडी किसी से ठुक गयी तो समझ लो कि आधी कमाई गयी पानी में। कभी-कभी तो पूरी गाडी छोड़कर भागना पडता है। सबसे बड़ा खतरा मौके पर पकड़ाने और भीड़ से पिटने का होता है। भीड की मार के सामने पुलिस की मार भी कहीं नहीं लगती है। एक बार फंस गये तो समझो महीने दो महीने के लिये बॉडी गयी अस्पताल में। वहाँ सही इलाज के लिये खीसे में रोज एक चेन चाहिये। ठीक होने के बाद शरीर पालिश उतरी खोटी चेन की तरह दिखने लगता है। रही-सही पालिश को पुलिस और वकील साहब कचहरी में उतार देते हैं।



मुसीबत एक नहीं कई होती हैं। चेन चोरों को कोई भी बाप अपनी लड्की देना पसन्द नहीं करता है। ठीक ही तो है जब हर गली-मोहल्ले में खुलेआम मूँछ पर ताव देकर गुन्डागर्दी करने वाले भाई लोग मौजूद हैं तो कोई बाप क्यों कर किसी ऊठाईगिरे को अपनी लड़की देगा?



अब थोडी अन्दर की बात जो किसी को नहीं पता वो भी बता दें। मोहल्ले के बच्चे जिन्हें धन्धे की खबर होती है वे फिल्मी विलेन की तरह सिर्फ चाकलेट से नहीं मान जाते। उन्हें साथ में चाहिये महंगे कोक, आलू-चिप्स और कुरकुरे के पेकेट। चेन मिलने की खबर के दिन तो मुए डामिनोज के पिज्जा के बगैर नहीं मानते। मजेदार बात यह है कि साल की दो चेन घरवाली जन्मदिन और शादी की वर्षगाँठ के नाम से झटक लेती है। हद तो तब हो गयी जब लाख समझाने के बावजूद एक बार वह चेन पहन कर निकली और शिकार बन कर लौटी। अब चोर को क्या पता था कि वह किसी हमपेशा की बीबी थी।


इस धन्धे में आगे आने वाले खतरे का नाम टेटू है। हाल ही में एक महिला ने अपने गले में मंगल सूत्र का टेटू बनवा लिया और जिन्दगी भर के लिये निश्चिंत हो गयी।



अपन ने तो बाबू पक्का मन बना लिया है कि पान की गुमटी लगा लेंगे, मुंगफली बेच लेंगे पर चेन चोरी नहीं करेंगे।  





रचियता



महेन्द्र सांघी








Tuesday, 26 March 2013

होली धमाका ** रंग में व्यंग्य (1)




आपने रंग को देखा होगा, आपने भंग को देखा होगा,
आपने रंग में भंग को भी देखा होगा। 
आईये आज मैं आपको अपनी
रचनाओं के माध्यम से रंग में भीगा
हास्य-व्यंग्य दिखाता हूँ। अर्ज है:-

होली और महंगाई
अच्छा हुआ दोस्त जो तूने
होली पर रंग लगा कर हंसा दिया
वरना अपने चेहरे का रंग तो
महंगाई ने कब का उड़ा दिया

दुश्मनी भुलाना
कितना आसान है
दुश्मनी को भुलाना
बस दुश्मन को घेरना
और उसे रंग है लगाना

दुश्मनी निभाना (पाकिस्तान के लिये)
कितना आसान है
दुश्मनी को निभाना
बस एक साईकिल एक टिफिन लेना
और उसमें बम लगाना

होली की गेर
होली की गेर में
सब हैं एक रंग
क्या अमीर क्या गरीब
सब हैं संग संग


बचना प्रिये
मेरे रंग तुम्हारा चेहरा
होली के दिन बिठाना पहरा
दिल तुम्हारा पास है मेरे
अब बचाना अपना चेहरा

ध्वजों ने खेली होली
अलग अलग धर्मों के ध्वजों ने
होली मनाई, एक दूसरे को खूब रंगा
बाद में सबने देखा तो पता चला
उनमें से हर एक बन चुका था तिरंगा

मोहब्बत के रंग
होली के रंग आज लगेंगे
कल उतर जायेंगे
मेरी मोहब्बत के रंग मगर
जिन्दगी भर साथ निभाएंगे

रंगों से एलर्जी
आपको रंगों से एलर्जी है
चलिये आपको रंग नहीं लगायेंगे
मगर साथ तो बैठियेगा
रंगीन बातों से ही होली मनाएंगे


Thursday, 14 March 2013

उफ्फ ! ये सिरदर्द (हास्य-व्यंग्य लेख)




सिरदर्द दुनिया की सबसे पुरानी बीमारी है आजतक जिसे जड़ से उखाड़ फेंकने के लिये कोई प्रभावी इलाज नहीं खोजा जा सका है। डॉक्टरों के अनुसार सिरदर्द के पीछे चार-पांच सौ कारण हो सकते हैं। शायद इसीलिये केंसर तथा घुटनों के जोड़ों के दर्द का शर्तिया इलाज करने वाले भी सिरदर्द का अचूक इलाज का दावा करते कभी नहीं देखे या सुने गये। गौर करें तो लगभग हर बीमारी के विशेषज्ञ मिल जायेंगे किंतु सिरदर्द के विशेषज्ञ डॉक्टर का साईन बोर्ड या विज्ञापन हमें कभी देखने को नहीं मिला।

सिरदर्द सर्वव्यापी, अमर और अविनाशी होता है।  जिन्दगी और मौत की तरह यह कभी भी प्रकट हो सकता है और कभी भी गायब। इसीलिये लोकतंत्र में यह काम से छुट्टी पाने का बहाना नम्बर एक बना हुआ है। सिरदर्द मुफ्त में दिया-लिया जाता है किंतु इसके आदी हो चुके कुछ लोग इसे मोल लेने के लिये भी तैयार हो जाते हैं।

सिरदर्द को पोलियो और चेचक की तरह जड़मूल सहित खत्म नहीं किया जा सकता है। इसलिये लगता है कि सरकार ने  इस बीमारी से निपटने की अनोखी योजना बना रखी है। वह यह कि देश के हर नागरिक को भरपूर सिरदर्द दे दिया जाये ताकि किसी को भी एक दूसरे से कोई शिकायत या जलन न हो। नतीजतन सिरदर्द सड़क छाप इंसान से लेकर प्रधानमंत्री तक सबको होता है। ईमानदार को भी होता है, बेईमान को भी होता है। इसी नीति के तहत सभी टीवी चैनल चौबीसों घंटों दिनरात अपने दर्शकों को मनोरंजन कम और सिरदर्द अधिक बाँट रहे हैं। देश में जब जब सिरदर्द कम होने लगता है तो सरकार पेट्रोल के दाम बड़ाने या रियायती गेस सिलेण्डर की संख्या सीमित कर देने जैसे विशेष कदम उठाती है और सिरदर्द की नयी फसल पूरे देश में लहलहाने लगती है। देश में सरकारी कामकाज इसीलिये धीरे होते हैं ताकि अधिक से अधिक लोगों को सिरदर्द बाँटा जा सके।

सरकार की इस नीति को जनता का भरपूर सहयोग मिल रहा है। सिरदर्द लेना और देना रिश्वत की तरह अब रिवाज बन गया है। पति-पत्नी, बेटे-बेटी, दोस्त-रिश्तेदार, अड़ोसी-पड़ोसी, बेचवाल-खरीददार सब एक दूसरे को सिरदर्द बाँटने या अपना सिरदर्द दूसरे के सिर पर ढोलने में लगे रहते हैं। नेकी कर दरिया में डाल और भलाई का जमाना न रहा जैसी कहावतों से साबित होता है कि अच्छे कामों का परिणाम भी सिरदर्द के रूप में सामने आ सकता है। प्यार करने जैसी पाक प्रक्रिया भी सिरदर्द से अछूती नहीं है। आज यदि दिल दिया दर्द लिया फिल्म की रीमेक बने तो उसका नाम अवश्य ही दिल दिया सिरदर्द लिया रखा जायेगा। कोर्ट-कचहरी के कई मामले तो पुश्तेनी सिरदर्द में तब्दील हो जाते हैं। 
मैं तो कहता हूँ कि देश की सारी समस्याओं का हल निकल सकता है यदि सिरदर्द का इलाज ढूंड लिया जाये।   

Wednesday, 13 March 2013

शरीर में एल्केलाईन और एसिड का संतुलन

शरीर में एल्केलाईन और एसिड का संतुलन
पी. एच. लेवल बताता है
शरीर में अधिक एसिड
वक्त के पहले बुड़ापा लाता है।

खराब त्वचा और बाल भी
अधिक एसिड  की ही हैं देन
बड़ता वजन, ऑस्टियोपोरोसिस और
सर्दी-सिरदर्द भी पा सकते हो मेन ।

अधिक तनाव एसिडिटी को बड़ाता है
संगीत, ध्यान, योग और  मसाज
निश्चित मानिये कि
तनाव को बहुत कम कराता है।

सामान्य पी एच लेवल
अच्छे पाचन का है कारक
लौकी, टिंडा, चौलाई, बथुआ
ये सब हैं अल्केलाईन के धारक

अंगूर, केला जामुन और
सेब, स्ट्राबेरी खायें
कम एसिड के लिये
पालक पनीर में बथुआ मिलायें

अधिकतर प्रोटींस व्यवहार में एसिडिक होते हैं 
अधिकतर फल और सब्जियाँ एल्केलाईन होते है
सही पी. एच. लेवल वाले लोग
रात भरपूर और अच्छी नींद सोते है।

( नेट पर हेल्थ आर्टिकल पढ़ा था। प्राप्त जानकारी को रचना बद्ध कर दिया जो कि सम्प्रेषण का अधिक सशक्त माध्यम है। प्रामाणिक जानकारी के लिये अपने फेमिली डॉक्टर से सम्पर्क करें। डॉ.  मित्रों से निवेदन है कि कृपया अपने कमेंट देकर यदि कोई त्रुटि हो तो सुधार करें या अतिरिक्त जानकारी देना हो तो देवें। धन्यवाद। )

Monday, 11 March 2013

फिल्मी गीतों के बोलों के पीछे छुपा हास्य




दोस्तों आप किसी भी फिल्मी गीत के बोल को ले लीजिये आपको उन बोलों के नेपथ्य में छुपी कोई न कोई हास्य की मजेदार बात पकड़ में आ ही जायेगी। लीजिये कुछ नमूने देखिये और फिर खुद कोशिश कर के देखिये।

गीत : तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
(क्योंकि इन आँखों का ट्रांसप्लांट मेरी आँखों में जो होने वाला है।)

गीत : राज की बात कह दूं तो जाने महफिल में फिर क्या हो?
(कुछ भी नहीं होने वाला। सच का सामना में आज मैं खुद अपना राज खोल कर तगड़ा माल कमाने वाला हूँ।)

गीत : गरीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा, तुम एक पैसा दोगे वे दस लाख देगा
(काश यह बात सत्ताधारी नेताओं की समझ में आ जाये कि यदि वे जनता को एक पैसा (प्रति रूपये में से जो पन्द्रह पैसे देते हैं उसके अतिरिक्त) देंगे तो जनता बदले में लाखों (वोट) देगी ।

गीत : बिना बदरा के बिजुरिया कैसे चमके
(बेवकूफ यह बदरा वाली बिजुरिया नहीं एरोप्लेन की लाईट है जो रात में चमक रही है।

गीत : ये दिल न होता बेचारा
(कितना अच्छा होता। फिर तो हार्ट अटेक ही नहीं होता।)

गीत : खिलोना जान कर तुम क्यों मेरा दिल तोड़ जाती हो?
( क्योंकि घर के दूसरे खिलोने ब्रांडेड और बहुत महंगे हैं।)

गीत : ये हरियाली और ये रास्ता
(जरूर बन्दा राष्ट्रपति भवन की सैर करता हुआ गुनगुना रहा है। वरना किसी और रास्ते पर ऐसी हरियाली कहाँ मिलेगी जो दिल यह गीत गुनगुनाने लगे) 

गीत : सपनों का सौदागर आया
(वोटों के बदले में सपने बेचने के लिये)

गीत : मै ना भूलूंगा, मै ना भूलूंगी
(बाप रे, दोनों भूलने के लिये तैयार नहीं हैं तो फिर तो तलाक निश्चित है।)

गीत : जिन्दगी भर नहीं भूलेगी ये बरसात की रात
(क्योंकि रेन वाटर हार्वेस्टिंग करवाने के बाद ये पहली बरसात है जब छत का पानी तेजी से बोरिंग वेल में जा रहा है।)

गीत : ए मेरे वतन के लोगों, जरा आँख में भर लो पानी
(क्योंकि पेट्रोल की बड़ी कीमतें चुकाने में याद आ जायेगी नानी)

गीत : ना मांगू हीरा मोती, ना मांगू सोना चांदी ये मेरे किस काम के
(मुझे तो बस अपना वोट दे दे, ये सब तो बाद में खुद-ब-खुद मेरी तिजोरी में चले आयेंगे।)

ग़ीत : बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना
(दीवाना हुए बिना काम कैसे चलेगा? मेरेज अरेंज करने का कांट्रेक्ट जो लिया है)


महेन्द्र सांघी


Thursday, 7 March 2013

डॉटर-डे


  लड़कियों  की  अपेक्षा  लड़कों   की
   पूरे  विश्व  में  पूछ-परख  ज्यादा है,
  यहाँ डॉटर डे के लिये कोई जगह नहीं
हाँ सन-डे (संडे) हर सप्ताह मनाया जाता है। 

आईये इस विश्व महिला दिवस के अवसर पर
हम बेटियों को बेटों की बराबरी का स्थान दिलायें, 
आज से ही आपस में अपने अपने स्तर पर
सेटरडे को डॉटर-डे कहने व लिखने  लग जायें।

Tuesday, 5 March 2013

पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों का दिमाग छोटा!


प्रश्न - दद्दू, वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों का दिमाग छोटा होता है। इसके क्या मायने निकालेंगे आप?

उत्तर - शोध की इस जानकारी के मायने बिलकुल साफ हैं कि पुरुषों के मुकाबले स्त्रियां अपने दिमाग का ज्यादा इस्तेमाल करती हैं और साथ ही घर के कामों में, घर के बाहर के कामों के मुकाबले ज्यादा दिमाग खर्च होता है। वे काम भी दिन-रात बिना किसी छुट्टी के करती रहती हैं। अब जो चीज ज्यादा खर्च होगी वह छोटी तो होगी ही।

Monday, 4 March 2013

सातवां सिलेण्डर



सातवां सिलेण्डर

समाज में सर्वसाधारण में प्रचलित व्यवहार रीति को आचार कहते हैं। न मालूम कुछ लोग देश में बड़ती महँगाई को लेकर बेकार की चिल्लपों मचाते रहते हैं, जबकि भृष्टाचार और घोटालों के माध्यम से देश के खजाने को पहले खाली करना और टेक्स व वस्तुओं की कीमतों में इजाफा करके प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीकों से उसे पुनः भरना देश की सरकारों के लिये आचार बन चुका है, फिर चाहे वे किसी भी पार्टी या क्षेत्रीय दल की हों। अपने इसी सामान्य आचार के तहत हाल ही में सरकार ने वर्ष में घरेलू गेस सिलेण्डरों की संख्या छ: तक सीमित करके सातवें सिलेंडर की कीमत बड़ा क्या दी, मानों देश में सरकार की आलोचना की सुनामी सी आ गयी।

मुझे लगता है कि यदि सरकार अर्थशास्त्र के फंडों के बजाय मार्केटिंग के फ़ंडों को अपना ले तो सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे। सरकार को चाहिये कि वह पुराने, गन्दे, ठुके-पिटे उड़े रंग के सिलेंडर गरीबों को वर्ष में जितनें चाहें उतने 500 रू. की कीमत पर ले जाने दे। इससे होने वाले घाटे की पूर्ति अमीर तबके के उन ग्राहकों से की जा सकती है जो वस्तु के बजाय उसकी आकर्षक पेकिंग और विज्ञापन से प्रभावित होकर उसकी असल कीमत से कई गुना अधिक दाम खुशी-खुशी चुकाने के लिये तैयार रहते है। उदाहरण के लिये नये नकोर सुर्ख लाल रंग के सिलेंडर के लिये घर की आंतरिक सज्जा के प्रति सजग कई ग्रहणियाँ आसानी से 600 रू चुकाने को तैयार हो जायेंगी।

जिस तरह क्राकरी पर आकर्षक फूल-पत्ती काड़ दिये जाने पर उसकी कीमत बड़ जाती है उसी तरह फूल-पत्ती व आकर्षक रंगों से सजे सिलेंडर 700 से 800 रूपयों की कीमत में आसानी से बिकेंगे। ब्रांडेड शूज़ व कपड़े पहनने वालों के लिये प्लॉस्टिक में लिपटे अनेक तरह के इम्पोर्टेड सिलेंडर्स की रेंज लायी जा सकती है जिनकी एवज में एक से लेकर दो हजार प्रति सिलेंडर वसूले जा सकते हैं। विदेशी कार में विदेशी कुत्तों को घुमाते दम्पतियों के लिये विशेष डिजायनर सिलेंडर लाये जा सकते हैं जिन्हें वे अपने स्टेटस सिम्बल को बनाये रखने की खातिर चार-पाँच हजार में भी खुशी खुशी घर ले जायेंगे। ऐसे ग्राहकों को लुभाने के लिये उन्हें बताया जा सकता हैं कि इन सिलेंडर्स को पेक करते समय हॉयजीन का ध्यान रखा गया है ताकि उनके चकाचक किचन में कीटाणूं प्रवेश न करें।  

काला बाजारी को रोकने के लिये कम्पनियाँ हर सिलेंडर को एक क्रमाक़ दे सकती है। ऐसी स्थिति में 786, 001, 555, 999 जैसे सभी विशिष्ट नम्बरों वाले सिलेंडरो की नीलामी की जाकर लागत से कई गुना कीमत वसूली जा सकती है। अमीर ग्राहकों को फंसाने के नुस्खे और भी हैं। बस कम्पनी को अपने विज्ञापन में यह बताना होगा कि उनकी गेस में विशिष्ट खुशबू मिलाई गयी है जो कि किचन से प्याज मसालों की दुर्गन्ध दूर कर देगी और मेहमान घर में प्रवेश करते ही वाह कह उठेंगे। खुशबू के प्रकार के अनुसार अतिरिक्त कीमत वसूली जा सकती है। सरकार अर्थशास्त्रियों के बजाय मार्केटिंग के उस्ताद लोगों पर विश्वास करके देखे, वे एक सिलेंडर बीस हजार मे भी यह विज्ञापन देकर बेच देंगे कि इस सिलेंडर की गेस की खुशबू इतनी जानदार है कि यदि लीक हो जाये तो सात समन्दर पार से सुन्दरियां दौड़ कर आसपास इकठ्ठी हो जायें।

मगर इन सबके लिये सरकार को सिलेंडरों की होम डिलीवरी बन्द करनी होगी। तभी अमीर लोग बड़े बड़े शो रूम्स से खुद गेस खरीदने आयेंगे और दूसरों को दिखाकर रौब गांठेंगे कि देखो हम कितना महँगा सिलेंडर वापरते हैं। अंत में अत्यंत गरीब तबके के लोगों को सिलेंडर आधी कीमत पर भी दिया जा सकता है जो कि मेड इन चाईना होगा और जिस पर वार्निंग लिखी होगी कि "सावधान चाईना के मोबाईल की तरह यह फट भी सकता है।"          

सजग माँ की सजग बेटी



महेन्द्र सांघी  की (कविताओं के विविध रंग हास्य और व्यंग्य लेखों के संग)

एक अजनबी ने
गली में खेलती नन्हीं बच्ची से
बड़ प्यार से पूछा कि
बिटिया चॉकलेट खाओगी आप?
आखें तरेर कर बच्ची ने
पलट कर दिया जवाब
कहा कि क्यों?
क्या आप लगते हो मेरे बाप?

अचानक इस हमले से हकबकाया युवक
बच्ची को बहलाने का
दूसरा प्रयास करते हुए
पुन: प्यार से बोला
बिटिया मैं तुम्हारा अंकल हूँ,
यदि तुम मेरी गोद में आओगी
तो न सिर्फ चॉकलेट बल्कि मुफ्त में
कुरकुरे और बिस्किट भी पाओगी।
बच्ची ने कहा कि नहीं
मै तो अब्बी की अब्बी शोर मचाऊँगी
और मुफ्त के जूते-चप्पलों से
अंकलजी आपको पिटवाऊँगी।

अजनबी युवक समझ गया कि उसका
अब वहाँ से खिसक लेना ही बेहतर है,
आज देश की नारियां
यदि दुर्गा समान हैं तो
आज के टीवी युग की ये
बच्चियाँ भी नहीं कमतर हैं।
इस बच्ची की माँ की तरह
देश की हर माँ सजग-समझदार बने
और अपनी नन्हीं बेटी को
सही-गलत की पहचान बताये,
ताकि इंसान के वेष में घूमते
कामुक भेड़िये
उनके बालपन का फायदा उठाकर
उनका शोषण न कर पायें।

4 मार्च 2013