Saturday, 15 March 2014

मैं गलत हूँ या नियमों में सुधार होना चाहिये?



साथियों यातायात नियमों के चलते गत दो दिनों में मुझ छोटी कार वाले ( मारूति 800) को दो बार तीन-तीन सौ रूपयों का फटका लग गया। कल जंजीर वाला चौराहे पर अपनी कार सड़क किनारे खड़ी करके रोहित केमिस्ट से दवाई खरीद रहा था कि यातातात पुलिस की क्रेन ने मेरी गरीब कार (मारूति 800) के पहियों में जंजीर डाल दी और टोइंग चार्जेस के 300/- रूपये झटक लिये। केमिस्ट से खरीदा गया सौ रूपयों का वेपोरायजर 400/- रूपयों में पड़ा। आज पुन: आनंद बाजार में रोड की साईड में कार खड़ी करके पंतजली से खराब गले के लिये आयुर्वेदिक दवाई खरीद रहा था कि एक बार फिर मुई क्रेन भूत की तरह प्रकट हुई और 300/- रूपयों का फटका लगाते हुए मेरे दिन भर के आनन्द की वाट लगा दी। लिहाजा मैनें 215 रूपयों की दवाई में से सिर्फ 35/- की दवाई रखी और 180/- रूपये घाटे की पूर्ति के लिये दवा लौटा कर बचा लिये। 60 वर्ष की उम्र पार कर लेने के बाद भी (जब सरकारी कर्मचारी रिटायर होकर अपनी कमाई का सुख भोग रहे होते हैं) मुझ जैसे आम आदमी को इसलिये काम करना पड़ता है क्योंकि आज की मंहगाई के जमाने में काम किये बिना जिन्दा नहीं रहा जा सकता हैं। मुझ जैसे अनेक इंसानों की संतानें अपने मां बाप को अकेला छोड़ कर प्रदेश के बाहर जाकर नौकरी कर रही है क्योंकि भष्ट नेता अधिकारियों ने टेक्स के पैसे अपनी जेबों में भरकर प्रदेश में विकास तो अवरूद्ध किया ही बल्कि जो उद्योग धन्दे इलाके की पहचान थे उन्हें भी अपनी गलत नीतियों से ताला लगा दिया।

हां, मैने मोटर व्हीकल एक्ट की धाराओं के तहत गलत जगह कार पार्क की और उसी की मुझे कीमत चुकाना पड़ी मगर मेरे मन में उठे कुछ प्रश्नों का समाधान कौन करेगा? प्रथमत: दोनों स्थानों पर मेरी कार काफी चोड़ी रोड़ पर साईड में दबाकर खड़ी की गई थी और उनसे यातायात में कोई व्यवधान नहीं हो रहा था। दूसरा शहर में पार्किंग के मुफ्त या पेड पार्किंग स्थान हैं कहाँ जहां मैं अपनी गाड़ी खड़ी करता। बताईये जंजीर वाला चौराहे पर स्थित ढेर सारी दवाई की दुकानों में से किसी एक से दवाई खरीदनी हो तो रोड के अलावा कोई जगह है जहाँ कोई कार पार्क कर सके। जनता वस्तुओं की कीमत में समाहित उत्पादन कर सरकार को दे, जमाने भर की वस्तुओं की खरीद पर विक्रय कर और सेवाओं (जो कोई और आपको दे रहा है) पर सेवा कर सरकार को दे। इनकम टेक्स भी दे, वाहन के लिये रोड टेक्स भी दे, सड़कों और पुलों पर से गुजरने के लिये टोल टेक्स भी दे, नाकारा सरकार और सिस्टम की वजह से पूरा पैसा चुकाकर भी नकली और मिलावटी चीजें खरीदने को भी मजबूर हो और फिर भी उसके पास सड़क पर वाहन खड़े करने का अधिकार नहीं। यदि सड़क पर वाहन खड़े करना जुर्म है तो क्या यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि वह समुचित जगहों पर पार्किंग की सुविधा मुहैया करवाए।
इन्दौर जैसे शहर में कम से कम एक लाख वाहन तो हरदम नियम विरूध्ध सड़क पर खड़े रहते ही हैं। अगर इतने लोग नियम तोड़ रहे हैं तो यह उनकी लापरवाही नहीं मजबूरी है जिसे वे जुर्माना भरने के तुरंत बाद फिर दोहराने के लिये मजबूर रहेंगे। मेरे मत में सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के लिये नियमों का अक्षरथ: पालन करना जरूरी नहीं है वे परिस्थितियों को देखते हुए स्वविवेक से जनहित में नियमों में ढील भी दे सकते हैं। पार्किंग के नियम इसलिये हैं कि यातायात अवरुद्ध न हो, अन्य वाहन चालको को असुविधा नहीं हो और दुर्घटनाएं नहीं हों। तो यातातात क्रेन को उन्हीं गाड़ियों पर कार्यवाही करना चाहिये जिनके कारण यातायात बाधित हो रहा हो न कि सड़क किनारे खड़ी हर गाड़ी पर। अक्सर मै देखता हूं कि रेस कोर्स रोड, जो कि शहर की अधिकतम चोड़ी सड़क है, पर साईड में खड़ी गाड़ियों पर रोज क्रेन जुर्माना ठोकती रहती है जबकि वहां कभी ट्रेफिक जाम नहीं होता। नहीं दूसरी और शहर के अनेक इलाके ऐसे हैं जहां लोग सिरफिरे तरीके से आड़े तिरझे वाहन खड़े कर देते हैं जिससे पूरा यातायात रूक जाता है। वहां जनता की मदद के लिये कोई क्रेन नहीं होती है। एक बार आर एन टी मार्ग की एक बिल्डिंग में रविवार को उठावने में शामिल हुआ। हमारी दो गाड़ियां रोड की बाजू में डली सफेद रेखा के अन्दर पार्क थी मगर क्रेन ने आकर चालान बना दिया। अब बताईये आर एन टी मार्ग जैसी चोड़ी सड़क पर, रविवार को जब यातायात था ही नहीं, क्या हमारी कारें यातायात में बाधक थीं। हां दीवान जी ने हमारे अनुरोध को स्वीकार कर स्वविवेक (जिसका मैने उपर उल्लेख किया है) का उपयोग किया और दो में से सिर्फ एक कार का जुर्माना वसूला। ऐसे स्वविवेक का उपयोग पहले पुलिस करती भी थी मगर जबसे शायद क्रेन को वसूली का टारगेट मिलने लगा है तब से वह सिर्फ उन चोड़ी सड़कों पर विचरती हैं जहां उसे पर्याप्त शिकार भी मिलते रहें और स्वंय क्रेन को चलने में आसानी भी हो और वह जाम में नहीं फंसे। शहर की अनेक दुकानों का धन्दा इसलिये भी खराब है क्योंकि वहां क्रेन के बहुत अधिक फेरे लगते है। लगता है कि अब बड़े माल्स जहां बड़ा पार्किंग एरिया होता है, के अलावा सड़क की अन्य किसी दुकान से खरीदारी करना जोखिम भरा हो चुका है। दोस्तों जबतक किसी गाड़ी से यातायात अवरूद्ध न हो या अन्य वाहन चालकों को परेशानी नहीं हो तब तक नियम में ढील दी जाकर जनता को राहत दी जानी चाहिये। अन्यथा सरकार या तो सार्वजनिक पार्किंग स्थान बड़ाए या फिर इतनी अधिक गाड़ियों को लाईसेंस न दे। क्या कहते हैं आप?        

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