Saturday, 19 October 2013

शरद पूर्णिमा की खीर



बहुत सम्भावनाएं दिखी मुझे
शरद पूर्णिमा के चांद में
नेताओं के वादे और घोषणापत्रों की 
खीर लेकर मैं बैठ गया
खुले आसमान में।

चांदनी की पवित्र, धवल, शीतल
किरणों का स्पर्श पाकर
खीर की रंगत निखरने लगी 
मन्द धीमी गति से उसपर
आन एयर राहत पेकेजों की
मोटी मलाई जमने लगी।

मुझे विश्वास हो चला कि
शरद पूनम की किरणॉ से
अभिमंत्रित ये खीर
अवश्य ही रंग लाएगी
इस करिश्माई खीर का प्रसाद पा
मेरे देश की जनता की
गरीबी अवश्य दूर हो जाएगी।  

मगर आखिर को वही हुआ
जिसका मुझे शुरू से था डर
खीर के पास देर रात तक
बैठने की मेरी मेहनत हो गई सिफर।
 
शहर के भृष्ट नेता अधिकारियों को
कुत्तों की तरह खीर की सूंघ लग गई
खुले आसमान में देर रात आवारागर्दी
के आरोप में मुझे जेल भेज कर
मुफ्त का माल उड़ाने की अभ्यस्त
उनकी तोंदें सारी खीर हड़प गई।

Wednesday, 9 October 2013

मोमबत्तियों का कतल

कल रात शाम 5 बजे से रात 10:30 बजे तक बंगाली चौराहा क्षेत्र की बिजली गुल रही तो मोमबत्तियों से काम चलाना पड़ा। हाँ ज़हन से निकल कर ये चार लाईनें अवश्य छिटक पड़ीं। 09/10/2013

कल देर रात तक दोस्तों
मुई बिजली ने न दिखाई शकल
माचिस की तीलियों ने कर दिया मगर
इस बीच हज़ारों मोमबत्तियों का कतल

Tuesday, 1 October 2013

धोखा (1) मिट्टी के गणेशजी





मित्रों कल की दुनिया भी धोखों से भरी हुई थी, आज भी है और कल भी रहेगी। ज्ञानी लोग इस दुनिया को ही धोखा बताते हैं। इंसान के बस में बस इतना ही है कि पुर्व के धोखों के अनुभवों से सबक ले और भविष्य में बचने का प्रयास करे। अपने ब्लॉग के माध्यम से अपने कुछ किस्से शेयर करनी चाहता हूँ। 

मिट्टी के गणेशजी 

हाल ही में सम्पन्न गणेश उत्सव के दौरान मैने पर्यावरणीय चिंताओं को ध्यान में रखते हुए प्लॉस्टर ऑफ पेरिस के साधारण गणेशजी के आकार से तीन गुना छोटे मिट्टी के गणेश जी खरीदे और घर लाकर उत्साह पूर्वक उनकी स्थापना की। और हां उनके लिये मुझे पीओपी के गणेशजी की कीमत से तीन गुना अधिक कीमत चुकाना पड़ी और साथ ही श्रीमती जी का उलाहना भी सुनना पड़ा कि क्या इतने छोटे से गणेश ले आए। खैर आ गए सो आ गए। हमने उनका प्रतिदिन विधिवत पूजन कर प्रसन्नता प्राप्त की। अनंत चतुर्दशी के दिन जब उनके विसर्जन का समय आया तो पत्नी ने सुझाव दिया कि पिछले वर्ष की तरह मोहल्ले के सार्वजनिक गणपति के साथ इन्हें भी रख देते है। मेरे मन में कुछ और था। मैं परखना चाहता था कि पर्यावरण मित्रता के नाम पर विक्रित तीन गुना छोटे और साथ ही तीन गुना अधिक कीमत वाले गणेशजी पानी में कितनी देर में गलते है। सो मैने उन्हें एक साफ स्टील की बाल्टी में साफ नर्मदा जल लेकर उन्हें प्रणाम सहित विसर्जित कर दिया। भावना यह भी थी कि गलने के पश्चात मिट्टी व जल किसी पेड़ के नीची डाल दूंगा। देर रात ऑफिस से लौटने पर देखा कि 7 घंटे तक जलमग्न रहने के बाद भी हमारे गणेश जी बिलकुल जस के तस थे। पेंट पॉलिश भी जरा सा नहीं उतरा। मैने सोचा कि चलो सुबह तक देखते हैं मगर रात्रि विश्राम के लिये जाने के पूर्व श्रीमती जी ने कहा कि ‘ सुनोजी मुझे तो यह बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा कि हम आराम से बिस्तर पर सोएं और गणेश जी पानी में डूबे रहें। मैने एक बार फिर गणेश जी को पानी से निकाल कर देखा और उन्हें पहले दिन जैसा चमकता, दमकता और मुस्कराता हुआ पाया। श्रीमती से बात कर मैने उन्हें विसर्जित करने का विचार छोड़ दिया और उन्हें सादर अपने ड्राइंग रूम के एक शेल्फ पर सादर सजा दिया। एक और जहाँ गणेश जी के धूर्त विक्रेताओं के प्रति मन में क्षोभ था वहीं गणपतिजी की वापसी की प्रसन्नता भी। सामाजिक संगठन मिट्टी के गणेश ही खरीदे जाने की अपील करने के साथ उनकी उपलब्धता भी सुनिश्चित करें तथा प्रशासन भी ऐसे धोखों से जनता को बचाने का उपाय सोचे।
आगामी कड़ियाँ अवश्य देखें एवं आपके साथ यदि कोई धोखे की घटना घटी हो तो लिख कर भेजें। 
धोखा (2) दूघ का नाप     धोखा(3) गेस चूल्हा रिपेयर 

Friday, 13 September 2013

मल्टी का चोकीदार ( सत्य घटना आधारित लधु कथा)




मान एक निर्माणाधीन बहुमंजिले भवन का चोकीदार था। हमेशा धुला हुआ साफ सुथरा एवं सफेद आधी बाँह का कुर्ता तथा पायजामा पहनने वाला अमान कम पड़ा लिखा मगर अपने काम के प्रति पूरी तरह से ईमानदार चोकीदार था। भर ठंड में अलसुबह वह पानी का पाईप लेकर भवन की दीवारों की तरी करने में जुट जाता। फिर ठेकेदार के आदमियों को स्टोर से सामान निकाल कर देता, परिसर की सफाई करता, बिखरी रेती को इकठ्ठा करता, ईटों को पानी से तर करता। माल की आवक जावक के बिल और चालान सम्हाल कर तार में लगाता। जब उसके मेनेजर आते तो उन्हें सलाम मारकर गमछे से साफकर कुर्सी लगाता और चौराहे से लाकर कट चाय पिलाता। मेनेजर तथा ठेकेदार के आदमी उसे दिन भर किसी न किसी काम से दौड़ाते ही रहते। भवन से उसे विशेष लगाव था क्योंकि उसने न केवल इस भवन को नींव की पहली ईंट के साथ बनते देखा था बल्कि हर ईंट को सुबह, दोपहर व शाम जल से तर करके मजबूत किया था। देर तक भवन के साथ जगते और अलाव तापते हुए उसने सर्द रातों का सन्नाटा जिया था। जब तक भवन अधूरा था उसके साये में चोकीदार की झोपडी नुमा कुटिया बनी रही और उसके मुन्ने मुनिया भवन के चप्पे-चप्पे, डगर-डगर बैखौफ खेलकर बड़े होते रहे। अब जब भवन दुलहिन सा सज-संवर कर अपने मालिकों की प्रशंसा और प्यार पाने के लिये पूरी तरह से तैयार हो चुका था तब कुछ वर्दीधारी सुरक्षा कर्मचारियों ने आकर भवन की सुरक्षा अपने हाथों में सम्हाल ली। अनेकों भवनों की चोकीदारी कर विदा हो चुके नरसिंह के लिये यह स्थिति नयी नहीं थी मगर वह उदास जरूर हो गया था। वह मेनेजर कि सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। मेनेजर ने पूछा कि अमान अब क्या करोगे? वह बोला बाबूजी जब तक नयी चोकीदारी नहीं मिल जाती तब तक दिहाड़ी मजदूरी ही करूंगा। उसने अमान  के कन्धे पर हँसते हुए हाथ रखकर कहा कि तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं है, तुम यहीं साफ-सफाई तथा भवन के रोजमर्रा की मरम्मत के काम देखोगे। दरअसल कम्पनी के सी.ई.ओ. ने अमान को संस्था में रखने की अनुमति मेनेजर को पहले ही दे दी थी। अपने कार्य के पहले दिन ही कम्पनी के कुछ सूटेड-बूटेड कर्मचारियों की नजर में अमान की साधारण देशी वेशभूषा खटकने लगी। उन्होंने मेनेजर से पूछ ही लिया कि इस चकाचक ऑफिस में इस कुर्ते-पजामें वाले का क्या काम है। मगर मेनेजर भी जिद्दी था। उसने शाम को ही बाजार से एक पेंट शर्ट खरीद कर अमान को लाकर पहनने को दी। अमान  सकुचाया और बोला कि बाबूजी मैने आज तक पेंट कमीज नहीं पहनी। मेनेजर ने समझाया कि  जमाने के अनुसार यदि तुमने अपने आप को नहीं बदला तो वह तुम्हें निगल जायेगा। कई बार समझाने के बाद उसने इस पहनावे को अपनाया और कम्पनी को सदा के लिये एक ईमानदार व मेहनती सेवक मिल गया। नया भवन भी बड़ा खुश था। उसके चप्पे-चप्पे का जानकार और बचपन का दोस्त जो उसके साथ था।

महेन्द्र सांघी    

(इस सत्य घटना आधारित लघु कथा के प्रमुख पात्र अमान ने कल 12.9.13 को अलसुबह इस संसार एवं अपने उस भवन से विदा ले ही ली। उसकी, मेहनत, इमानदारी और कर्तव्य निष्ठा को सलाम एवं श्रद्धांजली)         

Tuesday, 10 September 2013

गज़ल





एक मीठी सी गज़ल जब मन में गुनगुनाती है,
दिल के सोये तारों को हौले से छेड़ जाती है।

गज़लों में यारों होती है कुछ ऐसी कशिश
सुन लो तो मन की हरारत उतर जाती है।
प्यार के मायने मैने गज़लों से ही सीखे हैं
गज़ल प्यार को जल्द अंजाम तक पहुँचाती है।

सुन लेने के बाद गज़लें, तबियत के साथ
यारों क्या खूब मस्त मस्त नींद आती है।

मुश्किल होता है पहुँचाना प्यार का पैगाम
गज़लें यह पैगाम सीधे दिल तक पहुँचाती हैं।

गज़ल को जब मिल जाती है अच्छी आवाज़
करोड़ों दिलों पर वह राज़ कर जाती है।

दिल गज़ल गज़ल हो जाता है 'महेन्द्र'
जब आती, गज़ल सी उनकी प्रेम पाती है।

Saturday, 24 August 2013

मुफ्त की रोटी

कुत्ता खो देता है आक्रामकता
जब स्वीकार कर लेता है रोटी
लातें खाकर भी लोटता हैं पैरों में
स्वाधीनता छीन लेती मुफ्त की रोटी

आलोचक का मुँह बन्द हो जाता है
जब सत्ता से जम जाती है गोटी
सच, आदर्श और सिद्धांत धरे रह जाते परे
ईमान खरीद लेती, जेब में पहुँची रकम मोटी

वाह रे दुर्भाग्य! यदि गुलामी ही करनी थी तो
वह अंग्रेजी राज क्या बुरा था
आज की स्थिति देख लगता है कि
आजादी पूर्व का क्रांतिकारी मुफ्त में मरा था।

Tuesday, 20 August 2013

रक्षा का दोहरा वचन (दद्दू का दरबार)


- एमके सांघी

Webdunia
FILE

प्रश्न : दद्दू, देश में इस वर्ष राखी दो दिन मनाई जा रही है। आप अपनी बहन से राखी 20 अगस्त को बंधवाएंगे या 21 अगस्त को?

उत्तर : राखी दो दिन शायद इसलिए है कि देश में महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों के कारण बहनों को भाइयों से रक्षा का डबल वचन चाहिए। अत: सभी भाइयों को चाहिए कि वे अपनी बहनों से दोनों दिन राखी बंधवा कर रक्षा का दोहरा वचन दें।

Tuesday, 13 August 2013

मानस के रचियता

- महेन्द्र सांघी

WD


रामचरितमानस रचने में,
क्या-क्या शोध किया होगा?
पूज्य तुलसीदासजी आपने,
स्वयं को होम किया होगा।

रात-रातों को जागे होंगे,
दिनों में भी आराम न किया होगा।
थकित शरीर, दुःखित चरणों को,
क्या कोई सेवक मिला होगा?

समय पर भोजन न किया होगा,
नदी तट पर होकर भी न जल पिया होगा।
राम प्रेम के आवेगों से,
संचित जल भी अंखियों से बहा होगा।

सूख गया होगा मुख, खो गई होगी सुध,
निश्चल मन राम में रमा होगा।
बूंद-बूंद से भरे सरोवर,
उसी तरह आपने रामचरित रचा होगा।

रामचरित का हर प्रसंग,
जीवन रस मन में उतरा होगा।
वही जीवन रस चौपाईयां बनकर,
आपकी कलम से बह निकला होगा।

मानस की स्वरचित पंक्तियों को,
आपने कई-कई बार पढ़ा होगा।
आज सब मगन मुग्ध हो जाते हैं पढ़कर,
आपका तो रोम-रोम खिला होगा।

पर आपको कुछ न मालूम होगा,
आप तो राममय हो गए होंगे।
चौपाई, छंद व दोहों की दुनिया में,
बस जाकर के खो गए होंगे।

आपके इस महाग्रंथ की राम कहानी,
तो बस जानते होंगे श्री राम।
श्री गुसांई आपको शत-शत नमन,
जन्मदिवस पर बारंबार शत-शत प्रणाम।

Wednesday, 17 July 2013

ब्लड प्रेशर



डॉक्टर ने मेरा ब्लड प्रेशर नापा 
तो उसे एकदम से चक्कर आ गया,
आँखें फटी की फ़टी रह गयीं
गश खाकर बेचारा ज़मीं पर आ गया।

मैने उसके मुहँ पर पानी के छींटे मारे
अखबार से पंखा झला
फिर उसके जूते उतारे
और तलुओं को हौले से मला

तब कहीं जाकर
वह कुछ होश में आया
होश में आकर
धीरे से बुदबुदाया 

बोला कि मेरा यंत्र तुम्हारा
ब्लड-प्रेशर ज़ीरो बता रहा है
मुझे समझ नहीं आ रहा कि
तुम्हारा दिल कैसे धड़क पा रहा है

मैं हंसा कि डॉक्टर साब परेशान न हों
मैं अपने खून की हर बूंद को जानता हूँ
हर बूंद के हर कण की मैं
जात और रंग पहचानता हूँ

मेरे खून के सफेद और लाल रक्त कण
सत्ता के लिये दिन-रात लड़ते रहते हैं
ऑक्सीजन के वहन और वितरण में 
दोनों के गुट भारी भृष्टाचार करते हैं

श्रेय और स्वार्थ के लिये खून का हर कण
जब रंग के आधार पर एक दूजे से लड़ेगा
तो भला आप ही बताईये जनाब
ऐसे खून में फिर प्रेशर कहाँ से रहेगा।
हाथों मे जनाब प्रेशर तब आता है
जब एक हाथ दूसरे से मिल दोस्ती निभाता है
आजकल अपने देश का प्रेशर भी तो रसातल में है
क्योंकि हर नेता दूसरे नेता का गला दबाता है।

अंत में डॉक्टर साब आपने पूछा कि
बिन प्रेशर मेरा दिल कैसे धड़क रहा है
सीधी-सच्ची  बात है ठीक उसी तरह,
जिस तरह आजकल मेरा देश चल रहा है।

Monday, 10 June 2013

नेताजी का शेर से सामना


जंगल में एक दिन
एक सत्ताधारी नेताजी का
शेर से सामना हो गया,
नेताजी ने आँखें बन्द कर
अपनी कुर्सी को याद किया
और सोचा कि बस आज
ज़िंदगी और मौत के इस चुनाव में
उनका काम तमाम हो गया।

अप्रत्याशेत रूप से शेर ने
नेताजी का स्वागत किया
और अपनी गुफा में ले जाकर
प्रेम पूर्वक बैठाया,
फिर भी मारे डर के
भाषणवीर नेताजी के मुख से
एक शब्द भी
नहीं निकल पाया।

शेर ने मुस्करा कर कहा कि
ए, मेरे मित्र, राजनीति के शेर
कैसा है तुम्हारा जलवा
हमारे इस जंगल में आज कैसे
क्या तुम्हारी डरपोक प्रजा ने
कर दिया है तुम्हारे विरूद्ध बलवा।
हिम्मत बटोर कर नेताजी ने कहा
कि हे जंगल के राजा हे कृपानिधान
आपका आतिथ्य पाकर
मैं धन्य हुआ श्रीमान|

मगर जरा यह तो बताएं कि
आप मुझे किस तरह जानते है
आश्चर्य हुआ यह जानकर कि
आप मुझे भली तरह से पहचानते हैं।
शेर ने कहा कि एक विदेशी दम्पत्ति
काटेज में छोड़ गये थे अपना टीवी
शिकार से निवृत्त होकर उसे ही
टापते रहते हैं हम मियाँ और बीबी|
उसी से ही पता चला कि तुम तो हो
हमसे भी ज्यादा दुष्ट और कमीने
हम तो भूखे होने पर ही शिकार करते है
भरे पेट भी तुमने गरीबों के निवाले छीने|

जमानत पर छूटे नेता के मुख की तरह
नेताजी के चेहरे पर मुस्कान खेलने लगी
इस परिस्थिति का फायदा उठाने के लिये
अक्ल तेजी से दौडने लगी|
बोला मित्र हमें अपने कुछ
विरोधियों को निपटाना है
इल्जाम हमारे उपर न आये
कुछ इस तरह सलटाना है।

क्यों न मुफ्त भ्रमण के बहाने
उन्हें जंगल में भेज दिया जाये
निपटा दें आप उन्हें, और आपको भी
दो वक्त का भोजन मिल जाये|
चतुर शेर ने पूछा कि बदले में
हमें और क्या पेकेज मिलेगा
नेता ने कहा कि आपका यह
जंगल अभयारण्य बनेगा|
वादा रहा कि यहाँ के पेड़
हम नहीं काटेंगे.
आप हमारी पीठ खुजालें
हम आपकी खुजालेंगे।
इस बीच शेरनी ने इशारे से
शेर को अंदर बुलाया
अन्दर बुला कर मानवों का
आतिथ्य धर्म याद दिलाया|
पूछा नाथ हम इन्हें क्या
खिलायेंगे और पिलायेंगे
शेर ने कहा खाने में तो चारा बहुत है
पीने के लिये इंसानी खून मंगाएंगे|
तुम चमचे गीदड़ को साथ लेकर
जंगल के पास किसी खेत चली जाओ
किसान का खून इन्हें बहुत पसन्द है
ताजा ताजा वही ले आओ।
और हाँ उस गरीब का पता जरूर ले आना
नेताजी कल उसके घर अवश्य जाएंगे
सदभावना के थोड़े से आँसू बहा कर
पार्टी के लिये अनेक वोटों का जुगाड़ करवायेंगे।