Friday, 13 September 2013

मल्टी का चोकीदार ( सत्य घटना आधारित लधु कथा)




मान एक निर्माणाधीन बहुमंजिले भवन का चोकीदार था। हमेशा धुला हुआ साफ सुथरा एवं सफेद आधी बाँह का कुर्ता तथा पायजामा पहनने वाला अमान कम पड़ा लिखा मगर अपने काम के प्रति पूरी तरह से ईमानदार चोकीदार था। भर ठंड में अलसुबह वह पानी का पाईप लेकर भवन की दीवारों की तरी करने में जुट जाता। फिर ठेकेदार के आदमियों को स्टोर से सामान निकाल कर देता, परिसर की सफाई करता, बिखरी रेती को इकठ्ठा करता, ईटों को पानी से तर करता। माल की आवक जावक के बिल और चालान सम्हाल कर तार में लगाता। जब उसके मेनेजर आते तो उन्हें सलाम मारकर गमछे से साफकर कुर्सी लगाता और चौराहे से लाकर कट चाय पिलाता। मेनेजर तथा ठेकेदार के आदमी उसे दिन भर किसी न किसी काम से दौड़ाते ही रहते। भवन से उसे विशेष लगाव था क्योंकि उसने न केवल इस भवन को नींव की पहली ईंट के साथ बनते देखा था बल्कि हर ईंट को सुबह, दोपहर व शाम जल से तर करके मजबूत किया था। देर तक भवन के साथ जगते और अलाव तापते हुए उसने सर्द रातों का सन्नाटा जिया था। जब तक भवन अधूरा था उसके साये में चोकीदार की झोपडी नुमा कुटिया बनी रही और उसके मुन्ने मुनिया भवन के चप्पे-चप्पे, डगर-डगर बैखौफ खेलकर बड़े होते रहे। अब जब भवन दुलहिन सा सज-संवर कर अपने मालिकों की प्रशंसा और प्यार पाने के लिये पूरी तरह से तैयार हो चुका था तब कुछ वर्दीधारी सुरक्षा कर्मचारियों ने आकर भवन की सुरक्षा अपने हाथों में सम्हाल ली। अनेकों भवनों की चोकीदारी कर विदा हो चुके नरसिंह के लिये यह स्थिति नयी नहीं थी मगर वह उदास जरूर हो गया था। वह मेनेजर कि सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया। मेनेजर ने पूछा कि अमान अब क्या करोगे? वह बोला बाबूजी जब तक नयी चोकीदारी नहीं मिल जाती तब तक दिहाड़ी मजदूरी ही करूंगा। उसने अमान  के कन्धे पर हँसते हुए हाथ रखकर कहा कि तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं है, तुम यहीं साफ-सफाई तथा भवन के रोजमर्रा की मरम्मत के काम देखोगे। दरअसल कम्पनी के सी.ई.ओ. ने अमान को संस्था में रखने की अनुमति मेनेजर को पहले ही दे दी थी। अपने कार्य के पहले दिन ही कम्पनी के कुछ सूटेड-बूटेड कर्मचारियों की नजर में अमान की साधारण देशी वेशभूषा खटकने लगी। उन्होंने मेनेजर से पूछ ही लिया कि इस चकाचक ऑफिस में इस कुर्ते-पजामें वाले का क्या काम है। मगर मेनेजर भी जिद्दी था। उसने शाम को ही बाजार से एक पेंट शर्ट खरीद कर अमान को लाकर पहनने को दी। अमान  सकुचाया और बोला कि बाबूजी मैने आज तक पेंट कमीज नहीं पहनी। मेनेजर ने समझाया कि  जमाने के अनुसार यदि तुमने अपने आप को नहीं बदला तो वह तुम्हें निगल जायेगा। कई बार समझाने के बाद उसने इस पहनावे को अपनाया और कम्पनी को सदा के लिये एक ईमानदार व मेहनती सेवक मिल गया। नया भवन भी बड़ा खुश था। उसके चप्पे-चप्पे का जानकार और बचपन का दोस्त जो उसके साथ था।

महेन्द्र सांघी    

(इस सत्य घटना आधारित लघु कथा के प्रमुख पात्र अमान ने कल 12.9.13 को अलसुबह इस संसार एवं अपने उस भवन से विदा ले ही ली। उसकी, मेहनत, इमानदारी और कर्तव्य निष्ठा को सलाम एवं श्रद्धांजली)         

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