Tuesday, 30 April 2013

आप क्या कहेंगे इस बारे में.....


हाल ही में मेरे एक फेसबुक फ्रेंड एवं कवि के पिता श्री का दुखद निधन हो  गया। उन्होंने अपने पिता को समर्पित करते हुए एक भावपूर्ण रचना पोस्ट की। ग्रुप के कुछ मित्रो ने घटना पर दुख जताया, ढ़ाढस के दो शब्द  लिखे तथा रचना को भावपूर्ण बताते हुए उसकी तारीफ की।

इसके विपरित कुछ मित्रों के कमेंट मुझे ठीक नही लगे जैसे कि 'सुपर' या 'वाह', या अति-सुन्दर या 'बहुत अच्छे'। निश्चित रूप से ये कमेंट दुखद घटना के स्थान पर उनके उत्कृष्ट रचना के बारे में थे। मगर कमेंट करने वाले मित्रों को सोचना चाहिये कि उस  उत्कृष्ट रचना के साथ एक दुखद घटना भी जुड़ी हुई थी। क्या रचना की उत्कृष्टटता की तारीफ  से ज्यादा जरूरी उस दुखद घटना पर दुख व्यक्त करना नहीं है। यदि हमारे पास समय का अभाव है तो बेहतर होगा कि हम कमेंट ही ना करें। और यदि करें तो सही ढ़ग से करें। ऐसे अवसर पर लिखी रचना को उत्कृष्ट और भावपूर्ण अभिव्यक्ति कहा जा सकता है किंतु काव्य के माध्यम से दी गयी निधन की सूचना का जवाब   'सुपर' या 'वाह', या अति-सुन्दर या 'बहुत अच्छे' शब्दों से दिया जाना क्या आपको भी थोड़ा अजीब नहीं लगता है। यह उसी तरह से है कि किसी दुखद घटना की पोस्ट को भी हमारे कई मित्र 'लाईक' क्लिक कर देते हैं। आशा है कि आप मुझसे सहमत होंगे।  

Monday, 1 April 2013

वृक्ष देवता (महेन्द्र सांघी की लघु कथा)





जीवन भर मास्टर जी देव पूजन के पूर्व अपने आँगन स्थित बड़, पीपल एवं नीम के पेड़ों को भी वृक्ष देवता मानकर प्रतिदिन नियम और श्रद्धा पूर्वक जल से सींचते रहे, किंतु बदले में अपने लिये कभी कुछ भी नहीं मांगा। जो मिला उसी में खुश रहकर संतोष पूर्वक सादा जीवन जीते रहे। समय बीतता गया। बच्चे बड़े होकर जवान हो गये। बड़े पुत्र ने छोटा-मोटा धन्धा किया मगर मगर तेजी से पैसा कमाने की लालसा के कारण उसे धन्दे से होने  वाली कमाई में मजा नहीं आया। एक दिन जब वे पेडों को जल चड़ा रहे थे, बेटे ने अपनी असफलता की झुंझलाहट पिता पर उतारते हए उनसे पूछ ही लिया कि पिताजी आपने अपनी जीवन भर की पूजा-अर्चना के बदले इन वृक्ष देवताओं से रूखी-सूखी रोटी, चप्प्लें घिसने वाली नौकरी तथा खन्डहर मकान के अलावा क्या पाया। यदि इन ढकोसलों में समय नष्ट करने के बजाये आपने कुछ ढंग का काम किया होता तो माँ को जीवन भर इतने दुखों का सामना नहीं करना पड़ता और हम बच्चों के लिये भी आप चार पैसे जोड़ पाते। आहत पिता ने पूछा कि बेटा जरा यह तो बता कि क्या तेरी माँ ने तुझसे इस बारे में कभी कोई शिकायत की। नहीं ही की थी इसीलिये शायद बेटे के पास उनके इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं था। फिर भी काफी विचार करने के बाद पिता ने तय किया कि अपने लिये न सही किंतु औलाद के लिये उन्हें कुछ मांगना ही चाहिये। 
वृक्ष देवता तो मानों प्रतीक्षारत ही थे। मास्टर जी द्वारा मन्नत मांगे जाने के बाद कुछ ही महीनों के भीतर पुत्र का व्यवसाय चल निकला। रूपयों की वर्षा होने लगी। पुत्र ने पुराने मकान की जगह नया मकान बनवाने का निश्चय किया। कार्य आरम्भ होने के कुछ ही दिनों में पिता की अनुपस्थिति में पुत्र ने निर्माण में बाधा बन रहे तीनों पेड़ो को कटवा कर उनकी बलि चड़ा दी। पिता ने इस बात का पता चलने पर एक बारगी तो स्वयं को काटो तो खून नहीं वाली स्थिति में पाया। फिर उम्र तथा अनुभव ने उन्हें किसी तरह संयत किया। पूची जाने पर पुत्र की और से सपाट जवाब आया कि उसकी उन्नति किन्हीं देवताओं का आशीर्वाद न होकर उसके स्वयं के भाग्य और परिश्रम का परिणाम थी। रहा सवाल पर्यावरण का तो तीन पेड़ों के स्थान पर तीस सजावटी पौधे वह घर के लान में लगवाने जा रहा था। हताश पिता सोचने लगे कि काश घर के तीन बुजुर्ग पेड़ इस तीस पौधों को अपनी प्यार भरी शीतल छाँया दे पाते। उन्हें शक होने लगा कि वे भी अपने नाती-पोतों का मुख देख पायेंगे या नहीं।