जीवन
भर मास्टर जी देव पूजन के पूर्व अपने आँगन स्थित बड़, पीपल एवं नीम के पेड़ों को भी
वृक्ष देवता मानकर प्रतिदिन नियम और श्रद्धा पूर्वक जल से सींचते रहे, किंतु बदले
में अपने लिये कभी कुछ भी नहीं मांगा। जो मिला उसी में खुश रहकर संतोष पूर्वक सादा
जीवन जीते रहे। समय बीतता गया। बच्चे बड़े होकर जवान हो गये। बड़े पुत्र ने
छोटा-मोटा धन्धा किया मगर मगर तेजी से पैसा कमाने की लालसा के कारण उसे धन्दे से
होने वाली कमाई में मजा नहीं आया। एक दिन
जब वे पेडों को जल चड़ा रहे थे, बेटे ने अपनी असफलता की झुंझलाहट पिता पर उतारते हए
उनसे पूछ ही लिया कि पिताजी आपने अपनी जीवन भर की पूजा-अर्चना के बदले इन वृक्ष
देवताओं से रूखी-सूखी रोटी, चप्प्लें घिसने वाली नौकरी तथा खन्डहर मकान के अलावा
क्या पाया। यदि इन ढकोसलों में समय नष्ट करने के बजाये आपने कुछ ढंग का काम किया
होता तो माँ को जीवन भर इतने दुखों का सामना नहीं करना पड़ता और हम बच्चों के लिये
भी आप चार पैसे जोड़ पाते। आहत पिता ने पूछा कि बेटा जरा यह तो बता कि क्या तेरी
माँ ने तुझसे इस बारे में कभी कोई शिकायत की। नहीं ही की थी इसीलिये शायद बेटे के
पास उनके इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं था। फिर भी काफी विचार करने के बाद पिता ने
तय किया कि अपने लिये न सही किंतु औलाद के लिये उन्हें कुछ मांगना ही चाहिये।
वृक्ष
देवता तो मानों प्रतीक्षारत ही थे। मास्टर जी द्वारा मन्नत मांगे जाने के बाद कुछ
ही महीनों के भीतर पुत्र का व्यवसाय चल निकला। रूपयों की वर्षा होने लगी। पुत्र ने
पुराने मकान की जगह नया मकान बनवाने का निश्चय किया। कार्य आरम्भ होने के कुछ ही
दिनों में पिता की अनुपस्थिति में पुत्र ने निर्माण में बाधा बन रहे तीनों पेड़ो को
कटवा कर उनकी बलि चड़ा दी। पिता ने इस बात का पता चलने पर एक बारगी तो स्वयं को
काटो तो खून नहीं वाली स्थिति में पाया। फिर उम्र तथा अनुभव ने उन्हें किसी तरह
संयत किया। पूची जाने पर पुत्र की और से सपाट जवाब आया कि उसकी उन्नति किन्हीं
देवताओं का आशीर्वाद न होकर उसके स्वयं के भाग्य और परिश्रम का परिणाम थी। रहा
सवाल पर्यावरण का तो तीन पेड़ों के स्थान पर तीस सजावटी पौधे वह घर के लान में
लगवाने जा रहा था। हताश पिता सोचने लगे कि काश घर के तीन बुजुर्ग पेड़ इस तीस पौधों
को अपनी प्यार भरी शीतल छाँया दे पाते। उन्हें शक होने लगा कि वे भी अपने
नाती-पोतों का मुख देख पायेंगे या नहीं।
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