Wednesday, 23 April 2014

मतदान केन्द्र पर मीना बाज़ार





क्सर मतदान केन्द्र स्कूलों, सामुदायिक भवनों जैसी बड़ी जगहों पर होते हैं जहाँ काफी खुली जगह होती है। वैसे देखा गया है कि इन जगहों पर जनता के लिये सुविधा नाममात्र की होती है। यहाँ दूरदराज इलाके से कोई मतदान के लिये आए तो उसे पीने के लिये पानी तक नसीब नहीं हो। ऐसा क्यों।

गली मोहल्ले में गणेश पूजा या दुर्गा पूजा का छोटा सा आयोजन होता है तो उसके लिये प्रायोजक मिल जाते हैं जो अपने विज्ञापन के झंडे, बैनर टांग देते है या दुकान सजा लेते है और बदले में आयोजक को मोटी राशि दे देते हैं जिससे न केवल उसके खर्च निकल जाते हैं बल्कि कई बार मुनाफा भी निकल आता है। कई बार प्रायोजक का खर्च अधिक हो जाता है किंतु उचित प्रचार न होने की दशा में फायदा नहीं मिलता।

सरकार जो कि चुनाओं में जनता से टेक्स के रूप में प्राप्त भारी भरकम राशि खर्च करती है क्यों न हर मतदान केन्द्र पर प्रायोजकों की मदद ले। क्या हानि है यदि हर मतदान केन्द्र पर छोटी-बड़ी कम्पनियों को अपने उत्पादों की प्रचार सामग्री लगाने की सशुल्क इजाजत दे दी जाए। सोचने की बात है कि जिस जगह क्षेत्र की 60 से 70% बहुसंख्य जनता जुटने वाली हो वहां अपने उत्पाद के प्रचार के लिये कितनी कम्पनियाँ इकठ्ठा हो जाएंगी। हर मतदान केन्द्र पर मीना बाज़ार तक लग सकता है। तरह तरह के उत्पाद और दुकानें। मतदान करने के सबूत के तौर पर ऊँगली की स्याही दिखाने पर दाम में विशेष छूट। मनोरंजन के सारे लटके-झटके जैसे शॉट गन, रिंग, चकरी-झूले, महिलाओं के लिये कंगन-चूड़ियों की दुकान, जलेबी-चाट-ऑईस्क्रीम, गन्ने का रस, बरफ गोले के खाऊ ठिये। मीना बाजार ऐसा हो कि जो लोग मतदान करने नहीं जाते हों उनके बच्चे मेले (मतदान केन्द्र) पर चलने की जिद करने लगें।

राजनैतिक दलों के लिये सम्भव नहीं होता कि हर मतदाता तक सम्पर्क के लिये पहुँच सकें। मतदान केन्द्र पर हर प्रत्याशी अपना स्टाल लगा सकता है जहाँ वह अपनी पूर्व उपलब्धियों तथा वादों तथा घोषणापत्र को प्रदर्शित कर सके। मतदाता पहले इन स्टालों पर घूम फिर कर स्वयं की जानकारी को व्यवस्थित कर ले फिर सोच समझ कर वोट दे।

केन्द्र पर एक स्टाल पुलिस का भी हो जहाँ मतदाता प्रत्याशी का ताजातरीन आपराधिक रेकार्ड देख सके। पुलिस की गिरफ्त में कई वारंटी भी आ सकते हैं जो उन्हें विगत पांच सालों में नहीं मिले हों और वोट डालने आए हों।     

सोचिये आज जो मतदान बिलकुल नीरस होता है वह कितना रोचक-मनोरंजक हो उठेगा। मतदान के प्रतिशत में बड़ोतरी महँगाई की वृद्धी को पीछे छोड़ देगी। आचार संहिता के अंतर्गत राजनीतिक दलों को जनता को उपहार देने पर पाबन्दी है मगर मतदान के बाद तो जनता को उपहार दिये ही जा सकते हैं। सरकार व्यवस्था कर सकती है कि जो भी वोट डालेगा उसे लौटते समय रियायती दर पर पांच किलो शकर मिलेगी। इससे अधिकतम लोग वोटिंग के लिये टूट पड़ेंगे।

तय मानिये कि यदि उपरोक्त सुझाव को मान लिया जाए तो सिर्फ एक दिन में ऐसी रेकार्ड तोड़ बिकी होगी कि सेंसेक्स उपर छलांग मारेगा और टेक्स के रूप में राजस्व प्राप्ति के भी नए रेकार्ड बनेंगे। मतदाता भी उजाड़ केन्द्रों के स्थान पर ऐसे जगह पर वोट  डालने जाएगा जहाँ प्रायोजक लोग उसके लिये कालीन बिछा कर उसका स्वागत करने के लिये तत्पर बैठे होंगे।

कहने की ज़रूरत नहीं कि प्रायोजकों से प्राप्त राशी से सरकार का खर्च मुनाफे में बदल जाएगा। सरकार भी इस मुनाफे को अपनी तिजोरी में रखने के बजाए तत्काल केन्द्र पर ही खर्च कर दे। उदाहरण के लिये गरीब जनता कि लिये मतदान केन्द्र पर ही मुफ्त चिकित्सा जांच व निदान शिविर लगाया जा सकता है। फिर देखियेगा कैसे लोग वोट  डालने नहीं आते।

फिर हंग़ विधानसभा या लोक सभा की स्थिति आने पर चिंता न रहेगी। मध्यावधि चुनाव का भार उठाने के लिये प्रायोजक खुशी-खुशी पुन: तत्पर जो रहेंगे।    

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