(विनोद वार्ता)
वेबू - क्यों भई काका सुबह सबेरे कहां से चले आ रहे हो और दोनों
हाथों से ये माथा क्यों पकड़ रखा है?
काका- अरे पाक उच्चायुक्त ने हुर्रियत नेताओं से मुलाकात करने का फैसला किया और भारक पाक के बीच होने वाली सचिव स्तर की बात मोदी सरकार ने रद्द कर दी। आगे की बात बन और अब पाक ने सीमा पर गोलाबारी भी बड़ा दी है। अपना तो माथा सन्नाया हुआ है। पिछले दो घंटों में सिर दर्द के विज्ञापन वाली सारी गोलियां एक-एक करके आजमा ली, मगर दर्द कश्मीर के सवाल पर पाकिस्तान के रुख की तरह अड़ा हुआ है। वेबू- हां आज का अखबार और सारे चैनल भी भारतपाक के बिगड़ते रिश्तों की ही गाथा सुना रहे है। काका- इस बारे में तो अब तुम कोई बात न करो तो मेहरबानी होगी। वेबू- काका हर देशवासी का कर्तव्य है कि देश की रक्षा के मसलों पर पूरे तन, मन, धन से सहयोग न दे सके तो नाक, कान, गले से तो दे। अतः सभी को चाहिए कि सारी खबरों को सूंघकर, सुनकर अपनी गली, अपने दायरे में उस पर आगे चर्चा करे। हो सकता है ऐसे ही समुद्र मंथन से भारत-पाक और कश्मीर समस्या का हल निकल आए। काका- अफसोस की बात है कि खुले दिलों से चर्चा में करने का दावा करने वाले नेता बातचीत को जारी नहीं रख पाए। न चाहते हुए भी आखिर काका बोल पड़े। वेबू- काका यह तो होना ही था। उच्च पदों पर विराजमान नेता, अधिकारियों के अपने स्वयंके इतने निहित स्वार्थ, अक्षमताएं, सैनिक/राजनैतिक मजबूरियां होती हैं कि समस्या के समाधान के बजाय वे निरर्थक बयान बाजियों में ही उलझे रहते हैं। उन्हें अपनी एक-एक बात तौल कर बोलनी होता है तो वे विपक्षी की कही बात के छिलके उतारने में भी देर नहीं लगाते है। काका- हंसकर बोले यदि तुम देश के प्रधानमंत्री होते तो क्या करते? वेबू- अपन काका ठहरे आम आदमी। अपना प्रधानमंत्री होते तो पाकिस्तान से बात निचले स्तर से आरंभ करते। काका- जरा बात को विस्तार से खींचकर बताओ। वेबू- अरे काका अपन सबसे पहले पाकिस्तान की किसी पान की दुकान के चार ग्राहकों को निमंत्रण देते जिसमें भारतीय पान की दुकान के भी चार ग्राहक शामिल होते। यू नो, चर्चा करना पान की दुकान के ग्राहकों का रोजमर्रा का काम है। एक्सपर्ट होते हैं वे इसमें। पान की दुकानों पर कितनी ही समस्याएं आकर निपट भी जाती हैं। उसका मीडिया भी अनुमान नहीं लगा सकता। काका- तुम ठीक कह रहे हो। तुम्हारी प्रस्तावित चर्चा के लिए आ रहे डेलिगेशन की सुरक्षा और यात्रा पर कोई तामझाम भी नहीं होता और करोड़ों के खर्चे बच जाते। वेबू- पांच सितारा होटल भी बुक नहीं करना पड़ती। बैठक भी भारत-पाक की बॉर्डर की किसी पान की दुकान पर हो जाती। काका- लंबे चौड़े खाने के मीनू भी न बनाने पड़ते। वार्ताकारों को बस पान पेश कर दिए जाते वर्क लगाकर। वेबू- इन बचे करोड़ों रुपयों से कश्मीर में कई पान की नयी दुकानें खुल जाती, लोगों को रोजगार मिलता और युवा आतंकवाद में शरीक होना बंद कर देते। काका- और पान की दुकान पर लोग अदब मुलाहिजा सीखते भाई चारा बढ़ाते। वेबू- चर्चा में समय की भी बचत होती। पान के शौकीनों के पास पाव आधे घंटे से अधिक वक्त कहां होता है? वे तो इतने समय में ही कठिन से कठिन समस्या का तिंया पांचा करने में समर्थ हैं। काका- चलो अभी कहां कश्मीर का हल निकलने वाला है। अभी तुम युवा हो। कॉलेज में हो। छात्र संघ के चुनाव में खड़े हो जाओ। जब एक चाय वाला देश का प्रधान मंत्री बन सकता है तो भविष्य में तुम क्यों नहीं। वेबू- हो सकता है काका इस समस्या का हल मेरे संभावित प्रधानमंत्रित्व काल में ही लिखा हो। पहली सफल पान वार्ता के बाद यह चर्चा पूरे भारत व पाकिस्तान की पान की दुकानों पर फैल जाएगी, जिसमें दोनों देशों की अवाम हिस्सा लेगी। फिर देखना इस चर्चा की छाछ पर मक्खन सा तैरता हुआ हल किस तरह सामने आता है। |
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