मेरे साहित्य के ठेले का सफरनामा
लेखक : महेन्द्र कुमार सांघी
इंसान के जीवन का संघर्ष का शुभारंभ उसके जन्म के साथ ही हो जाता है। शुभारंभ इसलिए, क्योंकि बिना संघर्ष, बिना चुनौतियों के मानव जीवन नीरस ही होगा।
मेरा जन्म ग्राम आलोट जिला रतलाम (मप्र) में हुआ, जहां मेरे पिताजी जज थे। परिवार की जड़ें महू में थीं, जहां मेरे दादाजी स्व. न्यायमूर्ति हजारीलाल सांघी के नाम पर मेन स्ट्रीट को 2 भागों में बांटकर एक का नामकरण 'सांघी स्ट्रीट' किया गया था। मेरा एक जुड़वां भाई भी था, पर जन्म के बाद पहली तिमाही में ही वह जीवन का केस हार गया और मुझे अपने प्रतिनिधि के रूप में इस दुनिया में संघर्ष करने के लिए छोड़ गया।
जन्म के समय शिशु, डर नाम की चिड़िया से अनजान होता है। मां के आंचल की सुरक्षा से परिचित होते ही उसका परिचय असुरक्षा से भी स्वत: ही हो जाता है। किसी अजनबी को देखकर वह सहमने लगता है, मां से चिपटता है। बढ़ती आयु के साथ नए सुरक्षा कवच भी जुड़ते जाते हैं। एक अवस्था वह आती है, जब व्यक्ति एक-एक करके इन सुरक्षा कवचों के खोल से बाहर निकल अपने बूते पर संघर्षों का सामना करने के लिए स्वयं को तैयार करता है। यहीं से उसके अपने पैरों पर स्वयं खड़े होने की शुरुआत होती है, आत्मविश्वास तथा निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है। इस अवस्था को मैं जीवन का एक मह्त्वपूर्ण संघर्ष समझता हूं जिससे मैंने पार पाया।
एक संयुक्त परिवार का सबसे छोटा सदस्य होने के कारण माता-पिता के अतिरिक्त मुझे बड़े भाई व बहनों का भी सुरक्षा कवच तथा प्यार हासिल हुआ जिनके दिशा-निर्देश कर्ण के कवच कुंडल की तरह मेरे साथ रहे। स्वाभाविक रूप से आदत उंगली पकड़कर चलने की हुई एवं स्वभाव थोड़ा संकोची तथा अंतर्मुखी रहा।
मेरे 7वीं कक्षा के हिन्दी शिक्षक श्री हरि जोशी ने मुझे परिवार के सुरक्षा कवच से बाहर निकल अपनी पहचान बनाने का पहला सुअवसर प्रदान किया। स्कूल के वार्षिक कार्यक्रम में उन्होंने नृत्य, नाटक या परिहास न करवाकर हम बच्चों को कवि के रूप में एक कवि सम्मेलन में प्रस्तुत किया और इस तरह से कविता के बीज का मेरे मन में रोपण किया। बस यहीं से हिन्दी के प्रति मेरा विशेष प्रेम जाग्रत हुआ। हरि सर के निर्देशन में निबंध लेखन तथा वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लिया तथा पुरस्कार भी जीते। हिन्दी में सर्वोच्च नंबर आने लगे।
हायर सेकंडरी में साइंस बॉयोलोजी विषय लेने के बावजूद मेरा हिन्दी-प्रेम जारी रहा। हिन्दी के प्रसिद्ध कवियों की रचनाओं के साथ हिन्दी के निबंध तथा उपन्यास पढ़ने में समय का एक हिस्सा खर्च होता रहा, शब्दकोष बढ़ता गया, विचार समृद्ध होते चले गए, संकलित शेरो-शायरी से डायरी के पन्ने रंगने लगे। संकोची स्वभाव से मैं बाहर आने लगा।
कॉलेज में दाखिल होते ही मैं दोस्तों का चहेता बन गया। फ्री पीरियड हो या पिकनिक पार्टी, उनकी फरमाइशें शुरू हो जातीं कि 'यार सांघीजी, कुछ शे'र-वेर तो सुनाओ'। तत्कालीन अनेक प्रतिष्ठित कवियों की रचनाएं मुझे कंठस्थ याद होती थीं जिन्हें सुनाते-सुनाते पता ही नहीं चला कि कब एक के बाद एक मेरी स्वयं की रचनाओं का जन्म होने लगा।
स्कूली दिनों में सीखी शतरंज के खेल में प्रवीणता कॉलेज के दिनों में पूरे शबाब पर आ गई। कई बार खुली तथा जिला स्तर की प्रतियोगिताओं में शतरंज की जीत ने मुझे जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी व्यूह रचने तथा जीतने की ललक पैदा की तथा मुझ प्यादे को जीवन के हर क्षेत्र में 8वें घर की और बढ़कर वजीर बनने का मार्ग प्रशस्त किया।
पीएमटी की परीक्षा पास न कर पाने के कारण विज्ञान से मोहभंग़ हुआ। दिमाग को नाहक प्रताड़ित नहीं करने का फैसला लेते हुए कॉमर्स लेकर बी. कॉम. किया। रिजल्ट आने के दूसरे ही दिन गजरा गियर्स देवास में 210 रुपए प्रतिमाह की नौकरी लग गई। एक वर्ष के बाद ही फैक्टरी ने आईबीएम का पंच कार्ड आधारित प्रथम जनरेशन कम्प्यूटर सिस्टम लगवाया। शतरंज चैंपियन होने के कारण आईबीएम की आईक्यू टेस्ट पास करने में तनिक भी कठिनाई नहीं आई और मेरा 'पंच ऑपरेटर' के रूप में चयन हो गया। कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग आईक्यू का खेल ही तो होता है। कम्प्यूटर जनरेशंस बदलती रही और मैं प्रमोशन पाते हुए परिवार के पहले कम्प्यूटर प्रोफेशनल के रूप में स्थापित होता चला गया। आत्मविश्वास कुलांचे भरने लगा। सीख मिली कि 'अवसरों की प्रतीक्षा कर सही समय पर उन्हें भुनाने वालों की कभी हार नहीं होती।'
अपनी व्यावसायिक जीविका संवार लेने के बाद मन में बसा हिन्दी साहित्य-प्रेम फिर जागा। अपनी कुछ ताजातरीन क्षणिकाओं को लेकर मैं 'भास्कर' अखबार के तत्कालीन संपादक श्रवण गर्गजी से मिला तो उन्होंने न केवल उन्हें प्रकाशित किया बल्कि कहा 'कि तुम्हारी रचनाओं में पंच तो है'। उनका यह प्रोत्साहन मेरे लिए किसी प्रतिष्ठित पुरस्कार से कम नहीं था। यहीं से हास्य और व्यंग्य मेरी प्रमुख विधा हो गई। हालांकि मन की संवेदनशीलता अन्य विधाओं में भी साधिकार लिखने का अवसर देती रही।
1990 के दशक में मैं मप्र हिन्दी साहित्य समिति, देवास का सदस्य बना। मेरी कई प्रमुख प्रेम तथा हास्य-व्यंग्य की प्रेरणादायी रचनाओं का जन्म यहीं हुआ जिन्होंने मंच पर वाहवाही लूटी। सृजन में परिपक्वता आने पर यहीं पर मेरी सशक्त व्यंग्य रचना 'ठेला' का जन्म हुआ। इसकी प्रेरणा मुझे एक दिव्यांग ठेला चालक से मिली जिसका एक हाथ कोहनी के आगे कटा हुआ होने के बावजूद वह मजबूती से मीलों दूर माल ढोकर ले जाता था। 'ठेला' कई मंचों पर पढ़ी और सराही गई। मेरे अवचेतन मन ने तभी सोच लिया था कि मेरे प्रथम काव्य संग्रह का नाम 'ठेला' होगा।
50 की उम्र पार करते-करते मेरे कम्प्यूटर प्रोफेशन तथा साहित्यधर्मिता दोनों ने मुझे जीवन के स्वर्णिम मोड़ पर ला खड़ा किया। रोजी-रोटी और रचनाधर्मिता दोनों के संघर्ष आगे-पीछे चलते रहे। मैंने अपना स्वयं का कम्प्यूटर सेंटर खड़ा किया। कई औद्योगिक कंपनियों के लिए सॉफ्ट्वेयर डिजाइन किए। मेरी संस्था 'सांघी कम्प्यूटर्स' देवास, भोपाल के माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय का पहले डीसीए फिर पीजीडीसीए की रजिस्टर्ड स्टडी सेंटर बनी। मैंने स्कूलों में बच्चों के लिए कम्प्यूटर कोर्स डिजाइन किए तथा उन्हें स्कूलों के लिए संचालित किया। स्वयं प्राइमरी कक्षा के नन्हे बच्चों की कम्प्यूटर क्लास ली और मन का आनंद पाया।
मैंने लायंस क्लब ऑफ देवास सिटी ज्वॉइन किया और कई सेवा कार्य किए। हिन्दी की दक्षता ने लायंस के कार्यक्रमों में मास्टर ऑफ सेरेमनी के रोल दिलवाए। परिचय का दायरा बढ़ा। देवास, खंडवा, खरगोन तथा इंदौर में काव्यपाठ हेतु मंच मिले। जीजाजी जवाहरलाल गर्ग का मार्गदर्शन व आशीर्वाद मिला, जो स्वयं एक उत्कृष्ट कवि थे। खंडवा की सुरभि साहित्य संस्कृति अकादमी से मुझे 'चन्द्रमणि वशिष्ट स्मृति सम्मान' मिला। पहली बार किसी काव्य संकलन में मेरी कविता छपी। उसके बाद अब तक 10 संकलन आ चुके हैं।
सन् 2000 में श्री विनय छजलानी ने विश्व के पहले हिन्दी पोर्टल 'वेबदुनिया' की शुरुआत की। इस पोर्टल पर दैनंदिन खबरों के साथ कविता, साहित्य, धर्म, फिल्म, क्रिकेट व मनोरंजन जैसे 25 से अधिक चैनल्स थे। मेरी साहित्यिक रुचि को मानो मनमांगी मुराद मिल गई, विशेषकर 'दद्दू का दरबार' नामक कॉलम जिसमें दद्दू को पाठकों के प्रश्नों के रोचक उत्तर देने थे। मेरे अनुरोध पर प्रख्यात कार्टूनिस्ट देवेन्द्र शर्माजी, जो दद्दू की भूमिका निभा रहे थे, ने अपनी भूमिका मुझे दे दी। कॉलम सफल हुआ और 'दद्दू' के रूप में मेरी अनोखी पहचान बन गई। 'वेबदुनिया' पोर्टल पर मेरी यह भूमिका विगत 21 वर्षों से आज तक जारी है।
2006 में छः माह तक 'दद्दू का दरबार' का प्रकाशन 'नईदुनिया' के परिशिष्ट एमपी-09 में भी हर सप्ताह हुआ। पूरे प्रदेश से पाठकों के प्रश्नों के पोस्टकार्ड मुझ तक पहुंचते रहे और मैं उनके उत्तर देता रहा। इसके साथ ही 'वेबदुनिया' पोर्टल के अलावा पत्र-पत्रिकाओं में मेरे हास्य-व्यंग्य के आलेख तथा लघुकथाएं प्रकाशित होने लगीं और मैं कवि के साथ लेखक के रूप में भी स्थापित होता चला गया।
सन् 2012 में मैंने शहर की साहित्यिक संस्था 'रंजन कलश' तथा 'रोटरी काव्य मंच' की सदस्यता ली। इन संस्थाओं की मासिक काव्य गोष्ठियों के माध्यम से शहर के प्रतिष्ठित कवि तथा साहित्यकारों से निकटता बढ़ी और मेरी कई मंजी हुईं रचनाओं का भी जन्म हुआ जिन्होंने साथी कवियों को हंसाया भी और दिल पर दस्तक भी दी। कई काव्य संकलनों में मेरी कविताओं व लघुकथाओं को शरण मिली, मंच मिले और कई सम्मान भी और शहर में पहचान भी।
फिर सोशल मीडिया का जमाना आया। फेसबुक, व्हॉट्सएप तथा ब्लॉग पर मेरी कविताओं व हास्य-व्यंग्य के आलेख तथा सामाजिक सरोकार पर मेरी पोस्ट ने सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाई। 69 की उम्र पार करने के बाद भी मैं कामकाजी तथा सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हूं। मैं श्रीमती चम्पादेवी पारमार्थिक ट्रस्ट का ट्रस्टी हूं तथा उसके माध्यम से अपने समय का बड़ा हिस्सा समाजसेवा के लिए खर्च करता हूं।
वर्षों तक पापड़ बेलने के बाद मेरी काव्य रचनाएं अंतत: अपनी स्व. माताजी को समर्पित मेरे प्रथम काव्य संकलन 'ठेला' पर सवार हुईं। संघर्ष 'हर्ष' में बदला। 'ठेला' पुस्तक का लोकार्पण 2 जनवरी 2022 को राष्ट्रीय कवि पं. सत्यनारायन सत्तनजी, मप्र साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे तथा वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रवीन्द्र पहलवान के द्वारा हुआ। पुस्तक को प्रतिसाद व तमन्ना को आकाश मिला। समीक्षकों ने मेरे संकलन को 'अपने समय का महत्वपूर्ण दस्तावेज' तथा 'जिंदगी के विशाल कोलॉज़ का दस्तावेज' बताया है, जो मेरे लिए गर्व की बात है।
पुस्तक का नाम अवश्य ही 'ठेला' है, पर मुझे विश्वास है कि मेरी साहित्यिक उड़ान के लिए यह एक रॉकेट साबित होगी और मुझे साहित्य जगत की अगली कक्षा में लेकर जाएगी। ऐसा मेरा विश्वास, स्वयं का प्रयास तथा मां सरस्वती से प्रार्थना रहेगी।
मेरी साहित्यिक यात्रा में यदि मैं अपनी जीवनसाथी श्रीमती निर्मला सांघी का जिक्र नहीं करूं तो उनसे आंखें नहीं मिला पाऊंगा। वर्षों उन्होंने मेरी अधूरी रचनाओं के पन्नों को संभाले रखा तथा मेरे संघर्ष की साथी व साक्षी बनी रहीं।
कवि एवं लेखक बनने के साथ ही मेरी कोशिश एक विनम्र तथा अच्छा इंसान व देश का जिम्मेदार नागरिक बनने की रही। इसमें मैं कितना सफल रहा, इसका सही आकलन दुनिया करेगी।
महेन्द्र कुमार सांघी
18.10.2024
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