Saturday, 19 October 2024

आह! वो गर्मियों की छुट्टियां


आह! वो गर्मियों की छुट्टियां 

घर से निकल कर सौ मीटर दूर मेडिकल स्टोर तक गया की तेज धूप और गर्मी से जान निकल गई। तभी देखा की एक मां अपनी पांच छः वर्ष की थकी हुई नन्हीं सी जान को छतरी की छाया में घर लेकर जा रही थी। वहीं दूसरी और एक पिता अपनी बाइक पर दो पस्त लग रहे नन्हें बच्चों को कोचिंग से निकाल कर घर ले जा रहा था। मुझे याद आए बचपन के वे दिन जब मार्च अप्रैल में परीक्षा होते ही बस्ता किसी कोने या टांड़ पर और पूरे दो ढाई महीने बस खाना, पीना, खेलना, कूदना, घूमना, नाना मामा के यहां छुट्टियां मनाने जाना। जिंदगी का आनंद आ जाता था। 

अपने दिन भूलकर अब हम कितने क्रूर गए हैं की अपने जिगर् के  टुकड़ों को जरा सा चेन नहीं लेने देते। तिस पर भी मैने ऐसे मां बाप देखे हैं जो पढ़ने के लिए या कम नंबर लाने के लिए बच्चे को कचोटते ही रहते हैं। पर यह n सोचिएगा की आपको इस अपराध की माफ़ी मिल जाएगी। 

गर्मियों की दो माह की छुट्टियों को नाना मामा दादा दादी भाई बहनों के साथ बिताकर बच्चा जो संस्कार पाता था वे संस्कार उसे नही मिल रहे। बड़ा होकर जब वह अपनी गृहस्थी दूर कहीं अलग बसा ले और आपको अपने जीवन के अंतिम दिन किसी वृद्धाश्रम में बिताना पढ़े तो उनकी असंवेदन शीलता को कोसिएगा मत। वह आप ही की देन होगी।

महेंद्र सांघी



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