Saturday, 19 October 2013

शरद पूर्णिमा की खीर



बहुत सम्भावनाएं दिखी मुझे
शरद पूर्णिमा के चांद में
नेताओं के वादे और घोषणापत्रों की 
खीर लेकर मैं बैठ गया
खुले आसमान में।

चांदनी की पवित्र, धवल, शीतल
किरणों का स्पर्श पाकर
खीर की रंगत निखरने लगी 
मन्द धीमी गति से उसपर
आन एयर राहत पेकेजों की
मोटी मलाई जमने लगी।

मुझे विश्वास हो चला कि
शरद पूनम की किरणॉ से
अभिमंत्रित ये खीर
अवश्य ही रंग लाएगी
इस करिश्माई खीर का प्रसाद पा
मेरे देश की जनता की
गरीबी अवश्य दूर हो जाएगी।  

मगर आखिर को वही हुआ
जिसका मुझे शुरू से था डर
खीर के पास देर रात तक
बैठने की मेरी मेहनत हो गई सिफर।
 
शहर के भृष्ट नेता अधिकारियों को
कुत्तों की तरह खीर की सूंघ लग गई
खुले आसमान में देर रात आवारागर्दी
के आरोप में मुझे जेल भेज कर
मुफ्त का माल उड़ाने की अभ्यस्त
उनकी तोंदें सारी खीर हड़प गई।

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