Monday, 4 March 2013

सातवां सिलेण्डर



सातवां सिलेण्डर

समाज में सर्वसाधारण में प्रचलित व्यवहार रीति को आचार कहते हैं। न मालूम कुछ लोग देश में बड़ती महँगाई को लेकर बेकार की चिल्लपों मचाते रहते हैं, जबकि भृष्टाचार और घोटालों के माध्यम से देश के खजाने को पहले खाली करना और टेक्स व वस्तुओं की कीमतों में इजाफा करके प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीकों से उसे पुनः भरना देश की सरकारों के लिये आचार बन चुका है, फिर चाहे वे किसी भी पार्टी या क्षेत्रीय दल की हों। अपने इसी सामान्य आचार के तहत हाल ही में सरकार ने वर्ष में घरेलू गेस सिलेण्डरों की संख्या छ: तक सीमित करके सातवें सिलेंडर की कीमत बड़ा क्या दी, मानों देश में सरकार की आलोचना की सुनामी सी आ गयी।

मुझे लगता है कि यदि सरकार अर्थशास्त्र के फंडों के बजाय मार्केटिंग के फ़ंडों को अपना ले तो सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे। सरकार को चाहिये कि वह पुराने, गन्दे, ठुके-पिटे उड़े रंग के सिलेंडर गरीबों को वर्ष में जितनें चाहें उतने 500 रू. की कीमत पर ले जाने दे। इससे होने वाले घाटे की पूर्ति अमीर तबके के उन ग्राहकों से की जा सकती है जो वस्तु के बजाय उसकी आकर्षक पेकिंग और विज्ञापन से प्रभावित होकर उसकी असल कीमत से कई गुना अधिक दाम खुशी-खुशी चुकाने के लिये तैयार रहते है। उदाहरण के लिये नये नकोर सुर्ख लाल रंग के सिलेंडर के लिये घर की आंतरिक सज्जा के प्रति सजग कई ग्रहणियाँ आसानी से 600 रू चुकाने को तैयार हो जायेंगी।

जिस तरह क्राकरी पर आकर्षक फूल-पत्ती काड़ दिये जाने पर उसकी कीमत बड़ जाती है उसी तरह फूल-पत्ती व आकर्षक रंगों से सजे सिलेंडर 700 से 800 रूपयों की कीमत में आसानी से बिकेंगे। ब्रांडेड शूज़ व कपड़े पहनने वालों के लिये प्लॉस्टिक में लिपटे अनेक तरह के इम्पोर्टेड सिलेंडर्स की रेंज लायी जा सकती है जिनकी एवज में एक से लेकर दो हजार प्रति सिलेंडर वसूले जा सकते हैं। विदेशी कार में विदेशी कुत्तों को घुमाते दम्पतियों के लिये विशेष डिजायनर सिलेंडर लाये जा सकते हैं जिन्हें वे अपने स्टेटस सिम्बल को बनाये रखने की खातिर चार-पाँच हजार में भी खुशी खुशी घर ले जायेंगे। ऐसे ग्राहकों को लुभाने के लिये उन्हें बताया जा सकता हैं कि इन सिलेंडर्स को पेक करते समय हॉयजीन का ध्यान रखा गया है ताकि उनके चकाचक किचन में कीटाणूं प्रवेश न करें।  

काला बाजारी को रोकने के लिये कम्पनियाँ हर सिलेंडर को एक क्रमाक़ दे सकती है। ऐसी स्थिति में 786, 001, 555, 999 जैसे सभी विशिष्ट नम्बरों वाले सिलेंडरो की नीलामी की जाकर लागत से कई गुना कीमत वसूली जा सकती है। अमीर ग्राहकों को फंसाने के नुस्खे और भी हैं। बस कम्पनी को अपने विज्ञापन में यह बताना होगा कि उनकी गेस में विशिष्ट खुशबू मिलाई गयी है जो कि किचन से प्याज मसालों की दुर्गन्ध दूर कर देगी और मेहमान घर में प्रवेश करते ही वाह कह उठेंगे। खुशबू के प्रकार के अनुसार अतिरिक्त कीमत वसूली जा सकती है। सरकार अर्थशास्त्रियों के बजाय मार्केटिंग के उस्ताद लोगों पर विश्वास करके देखे, वे एक सिलेंडर बीस हजार मे भी यह विज्ञापन देकर बेच देंगे कि इस सिलेंडर की गेस की खुशबू इतनी जानदार है कि यदि लीक हो जाये तो सात समन्दर पार से सुन्दरियां दौड़ कर आसपास इकठ्ठी हो जायें।

मगर इन सबके लिये सरकार को सिलेंडरों की होम डिलीवरी बन्द करनी होगी। तभी अमीर लोग बड़े बड़े शो रूम्स से खुद गेस खरीदने आयेंगे और दूसरों को दिखाकर रौब गांठेंगे कि देखो हम कितना महँगा सिलेंडर वापरते हैं। अंत में अत्यंत गरीब तबके के लोगों को सिलेंडर आधी कीमत पर भी दिया जा सकता है जो कि मेड इन चाईना होगा और जिस पर वार्निंग लिखी होगी कि "सावधान चाईना के मोबाईल की तरह यह फट भी सकता है।"          

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